Shri Gurunanak dev - मेरे पैर उधर कर दो जहां खुदा न हों DA Image
7 दिसंबर, 2019|7:15|IST

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मेरे पैर उधर कर दो जहां खुदा न हों

सिख धर्म के प्रवर्तक और सिखों के प्रथम गुरु, श्री गुरुनानक देव जी का व्यक्तित्व असाधारण था। उन्होंने दुनिया के सबसे नए पंथ की स्थापना की। उन्होंने विभिन्न संस्कृतियों से संपर्क किया और अपना संदेश दिया। उन्होंने स्त्रियों की महत्ता स्वीकारी। उनके संदेश और दृष्टिकोण में अपूर्व गहरायी थी। एक बार श्रीगुरुनानक देव जी आराम कर रहे थे और सोते-सोते उनके पैर काबा की दिशा में मुड़ गए। इस पर एक व्यक्ति ने कहा, यह कौन है जो खुदा की तरफ पैर करके सो रहा है। इस पर श्रीगुरुनानक देव जी ने कहा, मेरे पैर उस दिशा में कर दो जहां खुदा न हों।

श्रीगुरुनानकदेवजी बाल्यावस्था से ही बेहद गंभीर स्वभाव और गहन चिंतन करने वाले थे। उन्होंने अंधविश्वास और आडंबरों का सख्त विरोध किया और सिख धर्म की स्थापना की। उनका कहना था कि ईश्वर एक है। वह सर्वशक्तिमान है और यही अंतिम सत्य है। उन्होंने ही लंगर प्रथा का आरंभ किया। लंगर में सभी छोटे−बड़े, अमीर−गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। आज भी गुरुद्वारों में लंगर की व्यवस्था चल रही है। उन्होंने दस शिक्षाएं दीं। उनका कहना था कि ईश्वर सब जगह और हर प्राणी में मौजूद है। ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता। ईमानदारी और मेहनत कर उदरपूर्ति करनी चाहिए। बुरा कार्य करने के बारे में कभी न तो सोचें और न किसी को सताएं। सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए। मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंदों को भी कुछ हिस्सा देना चाहिए। सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं। भोजन शरीर को जीवित रखने के लिए ज़रूरी है लेकिन लोभ−लालच और संग्रह की प्रवृत्ति बुरी है। श्री गुरुनानकदेव जी ने पूरे देश की यात्रा की और उनके विचारों का लोगों पर असाधारण प्रभाव पड़ा।

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  • Web Title:Shri Gurunanak dev