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Shani Jayanti Vrat katha : शनि जयंती पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, हर मनोकामना होगी पूरी

हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि पर शनि देव का जन्म हुआ था। इस दिन को शनि जयंती के नाम से जाना जाता है। इस पावन दिन शनि देव की पूजा- अर्चना करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

Yogesh Joshi लाइव हिन्दुस्तान टीम, नई दिल्लीThu, 6 June 2024 09:41 AM
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Shani Jayanti : हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि पर शनि देव का जन्म हुआ था। इस दिन को शनि जयंती के नाम से जाना जाता है। इस पावन दिन शनि देव की पूजा- अर्चना करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनि देव कर्म फल दाता हैं। शनि देव कर्मों के हिसाब से फल देते हैं। शास्त्रों में शनिदेव को न्यायाधीश की उपाधि मिलती है। शनिदेव हर व्यक्ति को उसके कर्मों का फल देते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शिन भगवान सूर्य के पुत्र हैं। जानें शनिदेव के जन्म से जुड़ी कथा-

Shani Jayanti Katha : सूर्य देव का विवाह राजा दक्ष की कन्या संज्ञा के साथ हुआ था। सूर्य देव के तीन संतान मनु, यमराज और यमुना थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार संज्ञा ने अपने पिता दक्ष से सूर्य के तेज उससे होने वाली दिक्कत के बारे में बताया। लेकिन राजा दक्ष ने अपनी पुत्री के बात पर ध्यान नहीं दिया और उन्होंने कहा कि तुम सूर्य देवता की अर्धांगिनी हो। पिता के ऐसा कहने पर संज्ञा ने अपने तपोबल से अपनी छाया को प्रकट किया। संज्ञा की छाया का नाम संवर्णा रखा गया।

आगे चलकर सूर्य देव की पत्नी संज्ञा की छाया के गर्भ से शनि देव को जन्म हुआ। भगवान शनि देवता का वर्ण बेहद श्याम था। लेकिन जब सूर्य देवता को इस बात का पता चला कि संवर्णा उनकी अर्धांगिनी नहीं है, तो सूर्य देवता ने शनिदेव को अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया। इससे शनि देव कुपित हो गए और उनकी दृष्टि सूर्य देव पर पड़ी, जिसकी वजह से सूर्य देव काले पड़ गए और संसार में अंधकार छाने लगा। परेशान होकर सूर्य देवता भगवान शिव के शरण में गए। तब शिव जी ने उन्हें छाया (संवर्णा) से क्षमा मांगने को कहा। भगवान शंकर के ऐसा कहने पर भगवान सूर्य ने छाया से क्षमा मांगी और शनि के क्रो से मुक्त हुए। 

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