sawan ekadashi ke upay aur vrat katha सावन माह की अंतिम एकादशी इस दिन, करें ये काम, भगवान विष्णु की बरसेगी कृपा, एस्ट्रोलॉजी न्यूज़ - Hindustan
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सावन माह की अंतिम एकादशी इस दिन, करें ये काम, भगवान विष्णु की बरसेगी कृपा

हिंदू धर्म में एकादशी का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। इस दिन पूरे विधि-विधान से भगवान श्री हरी विष्णु की पूजा-अर्चना करने से जीवन के सभी कष्ट दूर किए जा सकते हैं।

Shrishti Chaubey लाइव हिंदुस्तान, नई दिल्लीSun, 27 Aug 2023 07:20 AM
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सावन माह की अंतिम एकादशी इस दिन, करें ये काम, भगवान विष्णु की बरसेगी कृपा

Sawan Ekadashi: सावन माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पुत्रदा एकादशी (Putrada Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी का बहुत अधिक महत्व होता है। एकादशी का पावन दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन विधि- विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। पुत्रदा एकादशी 27 अगस्त, 2023 को है। इसे पवित्रा एकादशी भी कहते हैं। 

एकादशी व्रत महत्व- इस पावन दिन व्रत रखने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। यह व्रत संतान के लिए भी रखा जाता है।
इस व्रत को करने से निसंतान दंपतियों को संतान की प्राप्ति भी होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी का व्रत रखने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।

एकादशी व्रत के दिन व्रती को एकादशी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि व्रत कथा का पाठ करने से भगवान विष्णु की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है। आगे पढ़ें पुत्रदा एकादशी व्रत कथा...

 पुत्रदा एकादशी की कथा द्वापर युग के महिष्मती नाम के राज्य और उसके राजा से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिष्मती नाम के राज्य पर महाजित नाम का एक राजा शासन करता था। इस राजा के पास वैभव की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी। जिस कारण राजा परेशान रहता था। राजा अपनी प्रजा का भी पूर्ण ध्यान रखता था। संतान न होने के कारण राजा को निराशा घेरने लगी। तब राजा ने ऋषि मुनियों की शरण ली। इसके बाद राजा को एकादशी व्रत के बारे में बताया गया है। राजा ने विधि पूर्वक एकादशी का व्रत पूर्ण किया और नियम से व्रत का पारण किया। इसके बाद रानी ने कुछ दिनों गर्भ धारण किया और नौ माह के बाद एक सुंदर से पुत्र को जन्म दिया। आगे चलकर राजा का पुत्र श्रेष्ठ राजा बना।

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।