sawan 2019: Hindustani classical singer Pandit Chhannulal Mishra write up on sawan sangeet - संगीतकार का सावन: बचपन में याद हो गई थी पांच तरह की कजरी DA Image
14 नबम्बर, 2019|10:05|IST

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संगीतकार का सावन: बचपन में याद हो गई थी पांच तरह की कजरी

 pandit chhannulal mishra

यह मेरे जीवन का 84वां सावन है। जब होश संभाला तो ग्रामीण परिवेश में खुद को पाया। बचपन से किशोरावस्था के बीच ही सावन के संस्कार पड़ गए थे। सावन का मुख्य केंद्र कजरी हुआ करती थी। इसी दौरान मुझे कजरी के अलग-अलग स्वरूपों से परिचित होने का मौका मिला। मुझे पांच प्रकार की कजरी याद हो गई थी। 

बेशक मिर्जापुरी और बनारसी कजरी को सर्वाधिक लोकप्रियता मिली लेकिन आजमगढ़ी कजरी, छपरहिया कजरी और वृंदावनी कजरी भी कुछ कम नहीं है। किशोरावस्था पार करने के बाद मिर्जापुर, आजमगढ़, छपरा और वृंदावन जाकर इन विधाओं से मेरा परिचय और भी गहरा हुआ। हर जगह की कजरी खास लटके-झटके के साथ गाई जाती है। हर कजरी का अपना-अपना गायन विधान है। मिर्जापुरी कजरी की विशेषता नायिका का विरह शृंगार है। मेरी पसंदीदा मिर्जापुरी कजरी ‘गोरिया पाई नाहीं सइया के सवनवा में..सवना में हो सवनवा में, गोरिया पाई नाहीं सइया के सवनवा में...।' है। 

बनारसी कजरी के केंद्र में सावन का प्राकृतिक वातावरण प्रधान है। देवर-भाभी और ननद-भौजाई के बीच की मीठी नोकझोंक भी बनारसी कजरी का विषय हैं। बनारसी कजरी ‘सावन झरे लागेला धीरे धीरे, सावन झले लागेला धीरे धीरे' को मैं बड़े चाव से गाता हूं। आजमगढ़ी कजरी में नायक-नायिका संवाद को मुख्यत: स्थान मिला है। उदाहरण के तौर पर पत्नी कहती है ‘सावन भदउवा के निसी अंधरियी, कजरिया खेले जाबे हो नइहरवा' तो पति कहता है ‘जब तू धनिया नइहर चलि जइबी दूसर हम लाइब हम मोरी धानिया...।' 

छपरा की कजरी का लटका-झटका बाकी की तुलना में सबसे अलग है। सखी भाव पर आधारित कजरी अधिक प्रचलित है। जैसे ‘सावन भदहुआ क बरसै ल पनिया, लगैले बड़ी काई ओही पनघिटया, अपने महल से निकली सखी राधिका...।' वहीं वृंदावनी कजरी के केंद में भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रसंग समाहित हैं। इसका लाजवाब प्रमाण यह पारंपरिक रचना ‘ठाढ़े जमुना के तीर बा कृष्ण हरीर, मारै नयनवा के तीर, बजावे गाना बसिया ओही मधुबनवा...।' है।

मिर्जापुर की कजरहिया गली में सवाल-जवाब पर आधारित कजरी का बहुत बड़ा दंगल होता था। कजरी के साथ ही सावनी भी गाई जाती थी। अब तो सावन सुनने को ही नहीं मिलती। गुड़इन पीटने का एक खेल भी सावन में खासतौर पर खेला जाता था। बहनें गुड़िया बना कर पानी में रख देती थीं। हम लोग डंडे से गुड़िया को पीटते थे। उसके बाद बहनें चना और अनरसा खिलाती थीं। 

(अरविंद मिश्र से बातचीत पर आधारित)

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