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Sadhguru: सबको अपने में समाहित कर लेना ही धर्म है

अगर आपकी सोच ‘तुम’ और ‘मैं’ अलग-अलग हैं, तो आप जो भी करेंगे, वह गलत ही होगा। आप कोई भी काम सही कर ही नहीं सकते, क्योंकि आपका पूरा-का-पूरा वजूद ही गलत है, क्योंकि आपने बस ‘तुम’ और ‘मैं’ बना रखा है।

Sadhguru: सबको अपने में समाहित कर लेना ही धर्म है
Shrishti Chaubeyसदगुरु,नई दिल्लीWed, 11 Oct 2023 02:05 PM
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Sadhguru Quotes: आपके कर्मों से ज्यादा-से-ज्यादा लोगों का भला हो और फिर उसी हिसाब से कर्म करिए। जब बाहरी क्रिया-कलापों की बात आती है, तो उस पल के लिए उचित निर्णय लेना ही धर्म है। कोई यह तय नहीं कर सकता कि क्या सही है और क्या गलत। धर्म की व्याख्या प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने ढंग से करता है। इसलिए इसके रूप को लेकर मतभेद रहते हैं। लेकिन शाश्वत धर्म किसी भी परिभाषा से ऊपर है। यह व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ता है। अपने ‘मैं’ और तुम्हारे ‘तुम’ से मुक्त होकर सबको अपने में समाहित कर लेना ही वास्तविक धर्म है। 

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धर्म क्या है? कृष्ण के जीवन में बहुत लोगों ने उनसे यह प्रश्न पूछा था। जब द्रौपदी का विवाह होने वाला था, तो उन्होंने हर संभव कोशिश की कि द्रौपदी का विवाह पांच पांडवों से हो। उस वक्त द्रौपदी ने उनसे पूछा, ‘आपको पता है धर्म क्या है?’ एक बार कृष्ण ने भीम से कहा था, ‘हस्तिनापुर दुर्योधन के लिए छोड़ दो। चलो हम नया नगर बसाएंगे।’ इस पर भीम ने जवाब दिया, ‘आप देशद्रोही हैं। मैं दुर्योधन को मार डालना चाहता हूं और आप मुझसे यह कह रहे हैं कि मैं यह राज्य उसके लिए छोड़ कर चला जाऊं । कहीं और जाकर अपना राज्य बसाऊं।’

धर्म के बारे में आप क्या जानते हैं? अर्जुन और बहुत से दूसरे लोगों ने भी ऐसे ही सवाल उठाए। लोगों ने कृष्ण से पूछा, ‘क्या आपको वास्तव में पता है कि धर्म क्या है?’ कृष्ण ने हर किसी को धर्म के बारे में विस्तार से समझाया। मैं उनके एक-एक उत्तर की बात तो नहीं करूंगा, लेकिन उन्होंने सामान्य तौर पर यह कहा कि, अभी इस पल के कर्म के मामले में धर्म क्या है, यह मैं भी नहीं जानता, क्योंकि कर्म परिस्थितियों पर आधारित होते हैं। हालांकि हम इसके बारे में सही-गलत का फैसला करते हैं, लेकिन बाहर से देखने पर हम थोड़े-बहुत गलत भी हो सकते हैं। लेकिन जब बात अपने स्वधर्म (जीवन में खुद का कर्तव्य) की आती है, यानी मैं स्वयं अपने अंदर कैसे रहूं, तो उसके बारे में मैं पूरी तरह स्पष्ट हूं। किसी बुद्धिमान व्यक्ति के दिमाग में भी इस बात को लेकर शत-प्रतिशत स्पष्टता नहीं होती कि उसे किस तरह से कर्म करना चाहिए। वह हमेशा अपने निर्णय को तौलता है। अगर आप बाकी जीवों के नजरिये से देखने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि हम जो भी करते हैं, हमारा अस्तित्व, हमारा खान-पान, हमारा जीवन, हमारा सांस लेना सब कुछ किसी-न-किसी तरह से उन जीवों के साथ अन्याय ही है।

इस तरह इस दुनिया में कोई भी कर्म न तो सौ फीसदी सही है और न सौ फीसदी गलत। आपको बस यह देखना है कि आपके कर्मों से ज्यादा-से-ज्यादा लोगों का भला हो और फिर उसी हिसाब से कर्म करिए। जब बाहरी क्रिया-कलापों की बात आती है, तो उस पल के लिए उचित निर्णय लेना ही धर्म है। कोई यह तय नहीं कर सकता कि क्या सही है और क्या गलत। जब कर्म करने की बात आती है तो सौ फीसदी स्पष्टता सिर्फ एक मूर्ख या एक कट्टर इनसान के दिमाग में ही होती है। बाकी सभी लोग हमेशा अपने निर्णय को तौलते हैं, कि क्या सही है और क्या गलत। कोई दूसरा तरीका ही नहीं है। इस सृष्टि की प्रकृति ही ऐसी है।

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अब आप किसी की हत्या की बात कर रहे हैं। जरा सोच कर देखिए, जब आप खाते हैं, तो आप किसी की हत्या कर रहे होते हैं, जब आप सांस लेते हैं तो आप किसी की जान ले रहे होते हैं, जब आप चलते हैं तो भी पैरों तले किसी जीव की जान लेते हैं। अगर आप यह सब नहीं करना चाहते तो आपका अपना जीवन खतरे में पड़ जाएगा और तब आप खुद की जान ले रहे होंगे। तो आप किस धर्म का पालन करेंगे? बात बस इतनी है कि आप भीतर से कैसे हैं।

अगर आप में सभी को साथ लेकर चलने की भावना है, तो आप अपनी बुद्धि से उस परिस्थिति के मुताबिक काम करेंगे। अगर आपकी मानसिकता सभी को साथ लेकर चलने की नहीं है, अगर आपकी सोच ‘तुम’ और ‘मैं’ अलग-अलग हैं, तो आप जो भी करेंगे, वह गलत ही होगा। आप कोई भी काम सही कर ही नहीं सकते, क्योंकि आपका पूरा-का-पूरा वजूद ही गलत है, क्योंकि आपने बस ‘तुम’ और ‘मैं’ बना रखा है।

कृष्ण का पूरा-का-पूरा जीवन बस इसी बात को दर्शाता है। उनके जीवन में तुम और मैं नहीं था। बस ‘मैं’ और मैं या ‘तुम’ और तुम ही था। चाहे वे गोपियों के साथ हों, चाहे वे एक राजनेता के तौर पर काम कर रहे हों या फिर वे गीता का उपदेश दे रहे हों, उनका संदेश हमेशा एक ही था, सभी को अपने साथ समाहित करने का। एक बार जब सिर्फ मैं और मैं वाली बात आ जाए तो कर्म तो बस परिस्थिति और उचित निर्णय से तय होता है। कोई भी कर्म सौ फीसदी सही या सौ फीसदी गलत नहीं हो सकता। लेकिन जैसा कि कृष्ण ने हमेशा इस बात पर जोर दिया और मैं भी हमेशा यही कहता हूं कि स्वधर्म यानी ‘अपने अंदर कैसे होना है’ इस मामले में आप सौ फीसदी स्पष्ट हो सकते हैं।

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