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यहां पढ़ें शिव की लीलाओं में उनके विषपान करने की कथा

वासुदेव शरण अग्रवाल,ऩई दिल्लीPublished By: Anuradha Pandey
Tue, 27 Jul 2021 12:41 PM
यहां पढ़ें शिव की लीलाओं में उनके विषपान करने की कथा

शिव की लीलाओं में उनके विषपान करने की कथा अत्यंत सार्थक और महत्त्वपूर्ण है। कहा जाता है कि जिस समय देवता और असुर समुद्र मंथन कर रहे थे, उस समय कई रस उत्पन्न हुए, उन्हीं में क्रमश: हलाहल विष भी प्रकट हुआ। दसों दिशाओं में व्याप्त उसकी लपटों से देवता जलने लगे। किसी को यह साहस न हुआ कि उस विष को ग्रहण कर सके। तब देवों ने मिलकर शिवजी से प्रार्थना की, वे विष को शांत करें। शिव ने परिस्थिति समझकर इसे स्वीकार कर लिया। इसी कथा की पृष्ठभूमि में गुसाई जी ने लिखा है- 

जरत सकल सुर वृंद, विषम गरल जेहि पान किय। तेहि न भजसि मन मंद, को कृपालु शंकर सरिस॥
सचमुच विष पीकर शंकर ने समस्त संसार पर बड़ी कृपा की, अन्यथा विष की लपटों से प्राणिमात्र भस्म हो जाते। विष को पचाने का सामर्थ्य शिव में ही था। इसी पराक्रम के कारण वे देव-देव या महादेव कहलाए। विष साक्षात् मृत्यु का रूप है, जो प्राणों का लोप कर देता है। विषपान के कारण ही शिवजी की संज्ञा मृत्युंजय हुई। वैसे तो सभी देवता अमर माने जाते हैं, किन्तु विष के रूप में साक्षात् स्थूल मृत्यु से लोहा लेकर और उसे अपने शरीर में पचाकर वास्तविक मृत्युंजय की उपाधि शिव को ही प्राप्त हुई। 

विषपान करने पर भी शिव के शरीर से स्वर्गिक प्राण शक्ति की सुगंधि ही निकलती रही। मृत्यु की दुर्गन्ध उनका स्पर्श न कर सकी। वे मृत्यु से मुक्त होकर अमृत के गर्भ में प्रतिष्ठित हो गए। लिंग पुराण में समुद्र मंथन की कथा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि विषपान करने के अनंतर शिवजी हिमालय की कंदरा में एकांत में जाकर बैठ गए। देवता उनकी स्तुति करना चाहते थे कि उन्होंने विषपान जैसा महान पराक्रम किया। उन्होंने देखा कि शिवजी हिमालय की गुफा में ध्यानरत हैं। देवता वहीं पहुंचें और उनकी प्रशंसा करने लगे कि महाराज आपने जैसा पराक्रम किया, वैसा आज तक किसी ने नहीं किया था।

शिवजी ने उत्तर दिया कि मैंने यह स्थूल विष पीकर कुछ भी विचित्र बात नहीं की। मेरी दृष्टि में वस्तुत: बड़ा वह है, जो इस संसार में भरे हुए विष को पचा सकता है। संसार को निचोड़ने से या अनुभव करने से जो विष सामने आता है, वह स्थूल विष की अपेक्षा कहीं अधिक भयंकर है। सब के लिए वह प्रकट होता है। उस पर विजय पाना ही सच्चा पुरुषार्थ है। 
इस कथा के मूल में एक और भी प्राचीन कल्पना है। उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति समुद्र के समान अनंत और अपार है (पुरुषो वै समुद्र:)। इस समुद्र में मन रूपी जल-राशि भरी हुई है। नित्य प्रति उसी का मंथन होता रहता है और उसके मंथन से गुण और दोष दोनों प्रकट होते हैं। जो गुण या सत् पक्ष है, वह अमृत का रूप है, और जो दोष या असत् पक्ष है, वह विष का। जो दोषों को जीतकर मन के शिवात्मक रूप की रक्षा कर सकता है, वही सच्चा शिव है। 
(साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित ‘वासुदेव शरण अग्रवाल रचना-संचयन’ से साभार

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