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Ram Ji Ki Aarti : भगवान श्री राम की आरती, हे राजा राम तेरी आरती उतारूं

Ram Ji Ki Aarti : 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की जानी है। देशभर में इस पावन दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। इस पावन दिन भगवान भगवान श्री राम की आरती और स्तुति अवश्य करें।

Ram Ji Ki Aarti : भगवान श्री राम की आरती, हे राजा राम तेरी आरती उतारूं
Yogesh Joshiलाइव हिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीMon, 22 Jan 2024 06:30 PM
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Ram Ji Ki Aarti :  22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो गई है। इस दिन को लेकर पूरे देशभर में लोग काफी उत्साहित हैं। हिंदू धर्म परंपरा में प्राण प्रतिष्ठा एक पवित्र अनुष्ठान है, जो किसी मूर्ति या प्रतिमा में उस देवता या देवी का आह्वान कर उसे पवित्र या दिव्य बनाने के लिए किया जाता है। 'प्राण' शब्द का अर्थ है जीवन जबकि प्रतिष्ठा का अर्थ है 'स्थापना। ऐसे में प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ है 'प्राण शक्ति की स्थापना' या 'देवता को जीवंत स्थापित करना।' भव्य राम मंदिर में भी रामलला की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा हो गई है। देशभर में इस पावन दिन विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। इस पावन दिन भगवान भगवान श्री राम की आरती और स्तुति अवश्य करें। आगे पढ़ें भगवान श्री राम की आरती और स्तुति-

भगवान श्री राम की आरती-

हे राजा राम तेरी आरती उतारूं
आरती उतारूँ तुझे तन मन वारूं,

कनक शिहांसन रजत जोड़ी,
दशरथ नंदन जनक किशोरी,
युगुल  छबि को सदा निहारूं,
हे राजा राम तेरी आरती उतारूं........

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बाम भाग शोभति जग जननी,
चरण बिराजत है सुत अंजनी,
उन चरणों को सदा पखारू,
हे राजा राम तेरी आरती उतारूं........

आरती हनुमंत के मन भाये,
राम कथा नित शिव जी गाये,
राम कथा हृदय में उतारू,
हे राजा राम तेरी आरती उतारूँ........

चरणों से निकली गंगा प्यारी,
वंदन करती दुनिया सारी,
उन चरणों में शीश को धारू,
हे राजा राम तेरी आरती उतारूँ........

श्री राम स्तुति-

दोहा-
श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन
हरण भवभय दारुणं ।
नव कंज लोचन कंज मुख
कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि
नव नील नीरद सुन्दरं ।
पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि
नोमि जनक सुतावरं ॥२॥

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव
दैत्य वंश निकन्दनं ।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल
चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥

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शिर मुकुट कुंडल तिलक
चारु उदारु अङ्ग विभूषणं ।
आजानु भुज शर चाप धर
संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥

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इति वदति तुलसीदास शंकर
शेष मुनि मन रंजनं ।
मम् हृदय कंज निवास कुरु
कामादि खलदल गंजनं ॥५॥

मन जाहि राच्यो मिलहि सो
वर सहज सुन्दर सांवरो ।
करुणा निधान सुजान शील
स्नेह जानत रावरो ॥६॥

एहि भांति गौरी असीस सुन सिय
सहित हिय हरषित अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि
मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥

॥सोरठा॥
जानी गौरी अनुकूल सिय
हिय हरषु न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल वाम
अङ्ग फरकन लगे।

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