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Raksha Bandhan 2019: रक्षाबंधन आज, ये है राखी बांधने का सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त

Rakhi muhurat 2019 : भारतवासियों की राष्ट्रीय अस्मिता का त्यौहार स्वतंत्रता दिवस और भाई-बहन के अटूट रिश्ते का पर्व रक्षाबंधन आज है। बहनें, भाइयों को तिरंगे वाली राखी बांध रही हैं। ऐसा संयोग करीब 19 साल बाद बना है, जब भाई-बहन के प्यार का प्रतीक रक्षाबंधन स्वतंत्रता दिवस के दिन यानी 15 अगस्त को है। इससे पहले ये संयोग साल 2000 में पड़ा था। अब ये 2084 में आएगा। वैसे तो राखी सुबह 05:53 से रात 8:19 के बीच कभी भी बांधी जा सकती है क्योंकि इस बार भद्रा का साया नहीं है। लेकिन फिर भी कुछ मुहूर्त ऐसे हैं जब राखी बांधना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। ज्योतिषाचार्य विभोर इंदुसुत के अनुसार, अमृत चौघड़िया मुहूर्त को राखी बांधना अधिक श्रेष्ठ है। अमृत मुहूर्त 15 अगस्त को दोपहर 3 बजे से 3:41 बजे के बीच तथा शाम 6:57 से रात 8:19 तक रहेगा। इसके अलावा दिन में डेढ़ घंटे राहुकाल के होंगे। हो सके तो इस दौरान राखी न बांधें।  इस बार रक्षाबंधन पर दोपहर 1:30 से 15:00 राहुकाल होगा। राखी बांधने के लिए इस समय का त्याग करें।

आज नहीं भद्रा का साया
इस बार रक्षाबंधन का दिन पूरी तरह भद्रा से मुक्त है। भद्रा एक अशुभ मुहूर्तकाल होता है जो बीते कई सालों से रक्षाबंधन पर पड़ रहा था। लेकिन इस बार भद्रा नहीं होने से कभी भी राखी बांधी जा सकती है। किसी भी शुभ कार्य में भद्रा का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा में राखी नहीं बांधी जाती। भद्रा सूर्य की पुत्री हैं और उनका स्वभाव क्रूर है। ब्रह्मा जी ने कालगणना और पंचांग में भद्रा को विशेष स्थान दिया है। भद्रा में शुभ कार्य निषिद्ध हैं।

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विशेष योग
गुरुवार होने की वजह से भी इस बार राखी पर विशेष मुहूर्त है। 15 अगस्त को सवेरे 05.53 से शाम 6.01 तक विशेष योग रहेगा। रात्रिकालीन भी अमृत योग उपलब्ध होगा।

राखी बांधने के लिए ये समय उचित
सुबह 6 बजे से 7:30 बजे तक (शुभ)
सुबह 10:48 बजे से दोपहर 12:26 तक (चर)
दोपहर 12:26 से 1:29 बजे तक (लाभ)
दोपहर 3 बजे से 3 :41 बजे तक (अमृत)
शाम 5:19 बजे से 6:57 बजे तक (शुभ)
शाम 6:57 बजे से रात 8:19 बजे तक (अमृत)

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विशेष संयोग
ज्योतिषाचार्य पंडित सुरेंद्र शर्मा के अनुसार, श्रवण नक्षत्र और सौभाग्य योग  का संयोग रक्षा बंधन पर है। इस दिन हयग्रीव जयंती भी है। सूर्य कर्क राशि में और चंद्रमा मकर राशि में होंगे।  
पौराणिक महत्व

रक्षा बंधन का पौराणिक महत्व
श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पंच पर्व में से एक है। इसका व्रत नहीं होता है। रक्षा बंधन की उत्पत्ति की कथा सतयुग से जुड़ी है। एक समय जब इंद्र युद्ध में दानवों से पराजित होने लगे तो उनकी पत्नी इन्द्राणी ने एक रक्षा सूत्र इंद्र की कलाई पर बांधा था जिससे इंद्र को विजय प्राप्त हुई थी। देवासुर संग्राम में देवी भगवती ने देवताओं के मौली बांधी थी। तभी से रक्षा सूत्र बंधने की यह परंपरा चली आ रही है। कालांतर में यह परंपरा भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के रूप में प्रसिद्ध हुई।

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