Hindi Newsधर्म न्यूज़Pravachan: Bhakti Yoga is the easy path for a seeker

एक साधक के लिए भक्ति योग ही सहज मार्ग है

Pravachan: एक साधक के लिए साधना के दो प्रकार होते हैं। एक ज्ञान का मार्ग और दूसरा भक्ति का। भक्ति में भी दो प्रकार हैं, एक वानरी भक्ति, दूसरी मार्जरी भक्ति।

Shrishti Chaubey लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्लीTue, 12 March 2024 09:04 AM
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एक साधक के लिए साधना के दो प्रकार होते हैं। एक ज्ञान का मार्ग और दूसरा भक्ति का। भक्ति में भी दो प्रकार हैं—एक वानरी भक्ति, दूसरी मार्जरी भक्ति। ज्ञान का संबंध बुद्धि और तर्क से है, जबकि भक्ति का संबंध हृदय से है इसलिए किसी भी साधक के लिए भक्ति का मार्ग ही सहज है। 

ज्ञानी के भीतर मानो एक ही दिशा में गंगा बहती है। उसके लिए सब कुछ स्वप्नवत है। वह सदा स्व—स्वरूप में अवस्थित रहता है। परंतु भक्त के भीतर गंगा एक दिशा में नहीं बहती, उसमें ज्वार—भाटा आता रहता है। वह कभी हंसता है, कभी रोता है तो कभी नाचता—गाता है।
साधक दो प्रकार के होते हैं— एक प्रकार के साधक का स्वभाव बंदर के बच्चे की तरह होता है, दूसरे प्रकार के साधक का स्वभाव बिल्ली के बच्चे की तरह होता है। बंदर का बच्चा स्वयं अपनी मां को पकड़े हुए उससे लिपटा रहता है; पर बिल्ली का बच्चा स्वयं मां को नहीं पकड़ता, मां उसे जहां कहीं छोड़ दे, वहीं पड़ा रहकर वह ‘म्याऊं-म्याऊं’ करता रहता है। बंदर का बच्चा खुद अपनी मां को पकड़े रहता है, इसलिए अगर कभी उसका हाथ छूट जाए तो वह गिर पड़ता है और उसे चोट पहुंचती है। पर बिल्ली के बच्चे को यह भय नहीं है क्योंकि उसे उसकी मां स्वयं पकड़कर एक जगह से दूसरी जगह ले जाती है। इसी प्रकार, ज्ञानयोगी या कर्मयोगी साधक बंदर के बच्चे की तरह स्वयं के प्रयत्न से मुक्ति लाभ करने का प्रयास करता है। परंतु भक्त साधक ईश्वर को ही एकमात्र कर्ता जानते हुए बिल्ली के बच्चे की तरह, उन्हीं के चरणों में निर्भर होकर निश्चिंत हो पड़ा रहता है।

ज्ञानी कहता है, ‘सोऽहम्! मैं ही वह शुद्ध आत्मा हूं।’ परंतु भक्त कहता है, ‘अहा, यह सब उनकी महिमा है!’

‘यह सब कुछ मैं हूं,’ ‘यह सब कुछ तुम हो,’ ‘तुम स्वामी हो, मैं सेवक’— इन तीन भावों में से किसी भी एक में दृढ़ रूप से प्रतिष्ठित होने पर ही भगवद् प्राप्ति होती है।

शिव के अंश से जन्म होने पर मनुष्य ज्ञानी होता है, उसका मन सदा ‘ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या’ इसी बोध की ओर जाता है। विष्णु के अंश से जन्म हो तो प्रेम-भक्ति होती है। वह प्रेम-भक्ति कभी नहीं जाती। बहुत ज्ञान-विचार करने के बाद यदि किसी समय यह प्रेम-भक्ति कुछ कम भी हो जाए तो फिर और एक समय यह यदुवंश का ध्वंस करनेवाले मूसल की तरह देखते-देखते बढ़ भी जाती है। ज्ञानी के भीतर मानो एक ही दिशा में गंगा बहती है। उसके लिए सब कुछ स्वप्नवत है। वह सदा स्व-स्वरूप में अवस्थित रहता है।

परंतु भक्त के भीतर गंगा एक दिशा में नहीं बहती, उसमें ज्वार-भाटा आता रहता है। वह कभी हंसता है, कभी रोता है तो कभी नाचता-गाता है। भक्त भगवान के साथ विलास करना चाहता है। वह उस आनंद सागर में कभी तैरता है, कभी डूबता है, तो कभी उतराता है, जैसे पानी में बर्फ का टुकड़ा डूबता- उतराता रहता है।

पुराणों के मतानुसार भक्त एक है और भगवान एक। ‘मैं’ एक और ‘तुम’ एक। देह मानो एक घट है, इस देहरूपी घट में मन-बुद्धि अहंकाररूपी जल रखा है। ब्रह्म मानो सूर्य स्वरूप है। वह इस जल में प्रतिबिंबित हो रहा है। इसी से भक्त विविध ईश्वरीय रूपों के दर्शन करता है।

वेदांत के मतानुसार ब्रह्म ही वस्तु है, और सब माया, स्वप्नवत अवस्तु है। सच्चिदानंद सागर पर मानो अहंरूपी लाठी पड़ी हुई है। यदि उस अहंरूपी लाठी को उठा लिया जाए तो एक अविभक्त समुद्र रह जाता है, पर उस लाठी के रहते समुद्र के दो भाग दिखाई देने लगते हैं— लाठी के इस ओर एक और उस ओर एक। ब्रह्म ज्ञान होने से मनुष्य समाधिस्थ हो जाता है, उस समय यह ‘अहं’ मिट जाता है।

वेदांत मत के अनुसार जाग्रत अवस्था भी मिथ्या है। नारदादि आचार्य ज्ञान लाभ करने के बाद भी लोक कल्याण के लिए भक्ति के सूत्र लेकर आते रहते हैं। भक्ति चंद्र है और ज्ञान सूर्य। यदि तुम और भी विचार करना चाहो, यदि ‘ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या’ यह विचार करो, तो उसमें भी नुकसान नहीं। ज्ञान रूपी सूर्य के प्रभाव से बर्फ पिघल जाती है और केवल सच्चिदानंद सागर रह जाता है।

ज्ञान मानो पुरुष है और भक्ति नारी। ज्ञान भगवान के बैठकखाने तक जा सकता है, परंतु भक्ति उनके अंतपुर में प्रवेश कर सकती है।

इस युग के लिए भक्ति योग ही सहज मार्ग है। भक्ति भाव से ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए। उनकी पूर्ण शरणागत होना चाहिए। भगवान भक्त की रक्षा करते हैं। और यदि भक्त चाहे तो भगवान उसे ब्रह्म ज्ञान भी देते हैं। इच्छामय ईश्वर यदि चाहें तो भक्त को सब ऐश्वर्यों का अधिकारी बनाते हैं, भक्ति भी देते हैं और ज्ञान भी।

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