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Pradosh Vrat: क्या इस महीने के प्रदोष व्रत की तिथि पर है कंफ्यूजन, जानें डेट,उद्यापन करने से ही पूर्ण लाभ

When is Pradosh Vrat:शास्त्रों की माने तो प्रदोष व्रत कलयुग में अति मंगलकारी तथा भगवान सदाशिव भोलेनाथ की कृपा प्राप्त करने वाला माना जाता है। माघ शुक्ल पक्ष की प्रदोष का व्रत 21 फरवरी 2024 दिन बुधवार

Pradosh Vrat: क्या इस महीने के प्रदोष व्रत की तिथि पर है कंफ्यूजन, जानें डेट,उद्यापन करने से ही पूर्ण लाभ
Anuradha Pandeyज्योतिर्विद दिवाकर त्रिपाठी,नई दिल्लीWed, 21 Feb 2024 06:06 AM
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Kab hai Pradosh Vrat: पापों को दूर करने तथा जीवन में अंधकार को समाप्त करने के साथ-साथ सभी प्रकार के उद्देश्यों तथा मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत प्रदोष माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जो लोग भी प्रदोष व्रत को पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ करते हैं उन्हें सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है तथा पापों का समन हो जाता है। प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव प्रसन्न होते है तथा भगवान शिव माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। शास्त्रों की माने तो प्रदोष व्रत कलयुग में अति मंगलकारी तथा भगवान सदाशिव भोलेनाथ की कृपा प्राप्त करने वाला माना जाता है। माघ शुक्ल पक्ष की प्रदोष का व्रत 21 फरवरी 2024 दिन बुधवार को किया जाएगा। इसी दिन भीष्म द्वादशी का पर्व भी मनाया जाएगा। 21 फरवरी को सूर्योदय से लेकर दिन में 12:20 तक द्वादशी तिथि व्याप्त रहेगी। तत्पश्चात त्रयोदशी तिथि आरंभ हो जाएगी। प्रदोष काल में त्रयोदशी तिथि 21 फरवरी को प्राप्त होने के कारण प्रदोष का व्रत 21 फरवरी को ही किया जाएगा।

सभी पापों का समन
प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को यह व्रत बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ किया जाता है। किसी भी तिथि में सायं काल सूर्यास्त से एक घाटी पूर्व एक घटी बाद के काल को प्रदोष काल कहा जाता है। इस समय भगवान शिव की उपासना करने से तथा श्री हरि विष्णु की उपासना करने से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है। क्योंकि पद्म पुराण के अनुसार माना जाता है प्रदोष के समय भगवान महादेव कैलाश पर्वत पर नृत्य करते हैं तथा सभी देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। इस प्रकार प्रदोष काल में महादेव माता पार्वती की उपासना करने से सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्रति सहज रूप से हो जाती है। मनुष्य के सभी पापों का समन हो जाता है।

उद्यापन करने से ही पूर्ण लाभ
प्रदोष व्रत प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। दिनों के अनुसार प्रदोष व्रत का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। जैसे रविवार के दिन प्रदोष पड़ने से रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। सोमवार के दिन प्रदोष व्रत पड़ने से सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है। मंगलवार के दिन पड़ने के कारण भौम में प्रदोष व्रत कहा जाता है। गुरुवार के दिन प्रदोष पडने के कारण गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। शनिवार के दिन व्रत पडने से शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। शास्त्रों में सभी का अपना-अपना अलग-अलग महत्व बताया गया है । एक बार में 11 या 26 प्रदोष व्रत करने से अभीष्ट की सिद्धि होती है । प्रत्येक बार संकल्प संख्या पूर्ण हो जाने पर व्रत का उद्यापन करने से ही पूर्ण लाभ प्राप्त होता है। 

प्रदोष व्रत का विधि विधान :-  प्रदोष व्रत के दिन प्रात: काल स्नान आदि से निवृत होने के बाद भगवान शिव का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। दिन में केवल फलाहार ग्रहण करके प्रदोष काल में भगवान शिव का अभिषेक करना चाहिए तथा माता पार्वती सहित विशेष पूजा अर्चन करना चाहिए।
प्रदोष व्रत के दिन स्नान आदि से निवृत्त होकर घर की साफ सफाई करने के पश्चात स्नान आदि से निवृत होकर पूजा स्थल पर शांत मन से बैठ जाना चाहिए तथा गणपति, ईष्ट देव एवं सभी देवी देवताओं सहित भगवान शिव क्या ध्यान करना चाहिए। 
उसके बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। 

तत्पश्चात सभी देवी देवता को स्नान कराना चाहिए। *वस्त्र आदि अर्पित करने के पश्चात अक्षत, रोली, चंदन, गुलाल, गुलाब जल, सुगंधित द्रव्य, पुष्प, धूप दीप, नैवेद्य, घृत, पंचामृत, पंचमेवा तथा मौसमी फल भगवान शिव को अर्पित करना चाहिए। भगवान शिव की पूजन में बेलपत्र अवश्य अर्पित करना चाहिए भगवान शिव सहित पूजा घर में विद्यमान सभी देवताओं की पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ आरती करना चाहिए। उसके बाद भगवान शिव की किसी भी मंत्र का यथा संख्या जाप करना चाहिए। *सभी प्रकार के मंगल कामनाओं की पूर्ति के लिए “सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्येत्र्यंबके  गौरी नारायणी नमोस्तुते”  मंत्र का जप करना लाभदायक होता है।
सायं काल प्रदोष के समय भगवान सदाशिव भोलेनाथ का विधिवत अभिषेक
दिन भर जल तथा फल पर व्रत रहना रहते हुए सायं काल प्रदोष के समय भगवान सदाशिव भोलेनाथ का विधिवत अभिषेक पूजन करना चाहिए । विधिवत उत्तर पूजन करने के पश्चात आरती करते हुए भगवान शिव किसी भी मंत्र का श्रद्धा भाव के साथ जप करने के पश्चात प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।

 

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