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7 या 8 फरवरी, प्रदोष व्रत कब है ? जानें सही डेट, शुभ मुहूर्त, सामग्री लिस्ट, पूजाविधि, मंत्र और आरती

Pradosh Vrat 2024 Date and PujaVidhi : फरवरी महीने का पहला प्रदोष व्रत 7 फरवरी को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि प्रदोष व्रत के दिन शिवजी की विधिवत पूजा करने से सुख-सौभाग्य बढ़ता है।

7 या 8 फरवरी, प्रदोष व्रत कब है ? जानें सही डेट, शुभ मुहूर्त, सामग्री लिस्ट, पूजाविधि, मंत्र और आरती
Arti Tripathiलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीWed, 07 Feb 2024 08:40 AM
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Pradosh Vrat February 2024 : हिंदू धर्म में हर माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। प्रदोष व्रत के दिन भोलेनाथ की पूजा-उपासना का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा करने पर शुभ फलों की प्राप्ति होती है और जीवन के सभी संकटों से मुक्ति मिलती है। पंचांग के अनुसार,पौष महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 7 फरवरी 2024 दिन बुधवार को पड़ रही है। बुधवार के दिन पड़ने के कारण इसे बुध प्रदोष व्रत कहा जाएगा। आइए जानते हैं बुध प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त , पूजनविधि, सामग्री लिस्ट,मंत्र और आरती ...

प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त : पौष माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ 7 फरवरी 2024 को दोपहर 2 बजकर 2 मिनट पर होगा और अगले दिन यानी 8 फरवरी 2024 को सुबह 11 बजकर 17 मिनट पर होगा। प्रदोष व्रत के दिन शिवजी की प्रदोष काल में पूजा करना बेहद शुभ माना जाता है। इसलिए इस बार 7 फरवरी 2024 को ही प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल की पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 5 मिनट से लेकर 8 बजकर 41 मिनट तक रहेगा।

पूजा सामग्री लिस्ट

आक के फूल
बेलपत्र
धूप
दीप
रोली
अक्षत
फल-फूल
पंचामृत
मिठाई
भस्म
धतुरा
शमी का पत्ता

पूजाविधि :

प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठें।
स्नानादि के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें।
इसके बाद व्रत का संकल्प लें।
शिवजी की पूजा करें।
इसके बाद सायंकाल में भगवान शिव की विधिवत पूजा करें।
शिवलिंग का जलाभिषेक करें।
शिवलिंग पर बेलपत्र, फूल, धतुरा, आक के फूल और भस्म चढ़ाएं।
इसके बाद शिवजी के बीज मंत्र 'ऊँ नमः शिवाय' का 108 बार जाप करें।
शिवचालीसा का पाठ करें और अंत में शिवजी समेत सभी देव-देवताओं की आरती उतारें।
प्रदोष व्रत के अगले दिन शिव जी की पूजा करें और सूर्योदय होने के बाद ही पारण करें।

शिव चालीसा- 

॥दोहा॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

॥चौपाई॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट ते मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।


 

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