Pitru paksha 2019: पूर्वजों को तृप्त करती है श्राद्ध परंपरा - Pitru paksha 2019: Shradh prampara purvajon ko karti hai tript DA Image

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Pitru paksha 2019: पूर्वजों को तृप्त करती है श्राद्ध परंपरा

हे पितृ देव, आइये पधारिए और जलांजलि ग्रहण कीजिए। पितृ पक्ष में इस लघु आह्वान से हमारे पूर्वज तृप्त हो जाते हैं। पूर्वजों के प्रति मान-सम्मान और स्मरण करने की परंपरा प्राय: सभी धर्मों में है, लेकिन सनातन परंपरा में इसका एक पक्ष (पखवाड़ा) है।

हमारे जीवन के साथ कई ऋण एक साथ चलते हैं। कई हम चुका देते हैं। जो नहीं चुका पाते, वह है मातृ ऋण। यूं मातृ ऋण ममता का प्रतीक है। पिता का वात्सल्य है। इनका स्थान हमारे जीवन में सर्वोपरि है। जीवन के साथ यह हमारे साथ चलता है और मृत्यु के बाद भी बना रहता है। अर्थात, जिन्होंने हमें मनुष्य योनि में जन्म का सौभाग्य दिया, उससे कैसे कोई उऋण हो सकता है! इसलिए, पितरों को देवतुल्य कहा गया। उनका स्थान देवस्थान है। वह हमारे साथ और हमारे घर में सदा वास करते हैं। पितृ पक्ष अपने पितरों के प्रति श्रद्धा का भाव है। तर्पण एक परंपरा है, जो शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार पितरों को तृप्त करती है।

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श्रद्धा का यह शास्त्र अब नए कलेवर में है। परंपराओं का पालन हो रहा है, लेकिन नए रूप में। वर्जनाएं टूट रही हैं। महिलाएं किसी वक्त श्राद्ध कर्म नहीं करती थीं। आज बेटियां न केवल मुखाग्नि दे रही हैं, वरन श्राद्ध कर्म भी कर रही हैं। नियम-उपनियमों से आगे निकल कर वह अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का भाव दर्शा रही हैं। यूं मृत्यु उपरांत कर्मकांड या श्राद्ध की लंबी प्रक्रिया है। मुख्य आधार श्रद्धा है। वह किसी भी रूप में हो।

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शास्त्रीय आधार पर देखें तो इसमें कई तरह की राहत पहले से ही है। यदि आप नियमित श्राद्ध नहीं कर पाते, तो अमावस्या को सर्वपितृ तर्पण कर सकते हैं। पितरों को याद कर स्वयं भी तर्पण कर सकते हैं। मानसिक, आध्यात्मिक और कर्मकांडीय, तीनों ही रूपों में यह कार्य हो सकता है। अर्थात, श्राद्ध कर्म होना चाहिए, भले ही वह किसी भी रूप में हो।

पितृ पक्ष हमारी पर्व परंपरा का पहला बड़ा पड़ाव है। इसके बाद पर्वों की लंबी शृंखला का प्रारम्भ हो जाता है। इसलिए, पहले पितरों का स्मरण किया जाता है, फिर देवताओं का। एक और बात। हमारे जीवन में तीन का विशेष महत्व है। आदि-अनंत, लोकाचार, लोक व्यवस्था, शरीर विज्ञान, इहलोक-परलोक सब जगह तीन ही अवस्थाएं हैं। तीन ही लोक हैं। तीन ही देवियां हैं। हमारा शरीर भी तीन हिस्सों में ही बंटा है। तीन में जीवंतता है। तीन में ही मोक्ष की अवस्था। इसलिए, श्राद्ध भी तीन पीढ़ियों तक ही है। मां के पक्ष और पिता के पक्ष से तीन पीढ़ियां। इसके पीछे मूल कारण यही है कि हमारे स्मरण, पूजा, श्रद्धा और सामाजिक दायित्वों की सीमा केवल तीन चरण तक ही है। दूसरा कारण। हम यह मानते हैं कि तीन पीढ़ियों से पहले जो हमारे पूर्वज हुए हैं, उनका दैहिक और दैविक मोक्ष हो चुका है। देवतुल्य पिता को वसु, दादा को रुद्र और परदादा को आदित्य माना गया है। तिल देवान्न है। इसलिए, तर्पण भी इसी से होता है। आमतौर पर हम यमराज की पूजा नहीं करते। लेकिन श्राद्ध पक्ष में ही हम यम के प्रतीक (गऊ, कौआ, कुत्ता) का स्मरण करते हैं।

श्राद्ध कितनी पवित्र परंपरा है कि हम उन्हें भी अमावस्या पर याद करते हैं, जिनके बारे में हमको पता नहीं होता। इसलिए, ज्ञात-अज्ञात सभी के लिए तर्पण होता है। श्राद्ध हमारा पूर्वजों के प्रति दायित्व है, जिसका आज हम पालन कर रहे हैं, क्योंकि मोक्ष हर काल और हर जीवन की अमोघ इच्छा है। हम पितरों के आशीर्वाद से तृप्त हों। पितर तृप्त हों।

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