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सक्सेस मंत्र : शॉर्टकट से मंजिल पाने वाले लंबे समय तक नहीं टिक पाते

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जीवन कई कठिनाइयों से भरा हुआ है। हर कोई अपने सपने पूरे करने के लिए कड़ी मेहनत करता है। मगर इनमें से कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो मंजिल पर जल्दी से पहुंचने के लिए शॉर्टकट रास्ते अपना लेते हैं। हो सकता है ऐसे लोगों को कामयाबी जल्दी मिल जाए, मगर यह ज्यादा देर नहीं टिक सकती है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो सपनों को पूरा करने के लिए अपने उसूलों पर भरोसा करते हैं और आगे बढ़ते हैं। ऐसे लोगों को सफलता के लिए इंतजार तो करना पड़ सकता है, मगर यह दृढ़ होते हैं और छोटी-मोटी परेशानियों से डर कर अपना रास्ता नहीं बदलते हैं। ऐसा ही कुछ आज की कहानी में भी बताया गया है।

एक बार आमोद, अधीर और अभय नामक तीन मित्र गुरु की तलाश में निकले। बहुत खोजने के बाद तीनों एक गुरु के पास पहुंचे। तीनों ने गुरु से निवेदन किया किया कि उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार किया जाए। मगर गुरु का नियम था कि वह केवल योग्य शिष्य को ही दीक्षा देते थे। इसलिए गुरु ने कहा, जाओ जंगल से लकड़ियां ले आओ किन्तु ध्यान रहे लकड़ियां सूखी ही होना चाहिए।

गुरु की बात सुनकर तीनों मित्र जंगल की ओर निकल पड़े। उन्होंने आधा जंगल पार कर लिया था, मगर अब तक उन्हें सूखी लकडि़यां कहीं नहीं मिली थीं। हताश और निराश होकर वह एक पेड़ की छांव में सुस्ताने लगे। तभी सामने से एक व्यक्ति लकड़ियों का गट्ठर लेकर आता हुआ दिखाई दिया। अभय ने जैसे ही उस लकड़हारे को देखा, आमोद और अधीर को बताया। तीनों मित्रों ने उससे पूछा, भाई ! ऐसी सूखी लकड़ियां कहां से ला रहे हैं, हमें भी बताएं। 

वह अनजान व्यक्ति बोला, इस जंगल में सूखी लकड़ियां खोजना, आटे में नमक खोजने जैसा है। अगर आप लोगों को सूखी लकड़ियां ही चाहिए तो यहां से चार योजन की दुरी पर कंटक नाम की एक पहाड़ी है। उस पर आपको ढेर सारी लकड़ियां मिल जाएगी। इतना कहकर वह व्यक्ति चल दिया।

तीनों मित्रों ने आपस में सलाह की। आमोद बोला, इतनी दूर उस पहाड़ी पर जाकर लकड़ियां लाने से तो बेहतर है कि इसी जंगल की लकड़ियां सूखा ली जाएं। इतने में अभय बोला, यहां के राजा ने इस जंगल से लकड़ियां काटने पर पाबन्दी लगा रखी है। यदि हमने ऐसा किया तो यह राज द्रोह होगा। यह सुनकर आमोद बोला, इस बात की किसी को कानों कान खबर तक नहीं होगी। किन्तु आमोद की बात से अन्य दोनों मित्र असंतुष्ट थे। अतः वह आमोद को वही छोड़कर आगे चल दिए ।

चलते–चलते वह दोनों काफी दूर आ गए और फिर से थककर एक पेड़ के नीचे आराम करने लगे। इतने में उन्हें एक और लकड़हारा लकड़ियों का गट्ठर लेकर आता हुआ दिखाई दिया। अधीर ने सोचा, क्यों ना इस लकड़हारे से लकड़ियां मांग ली जाएं। यही सोचकर उसने लकड़हारे से कहा, श्रीमान ! क्या आप हमें थोड़ी लकड़ियां दे सकते हैं? लकड़हारा बोला, क्यों नहीं! बाजार ले जाकर बेचने से अच्छा है, मैं यही बेच दूं। आपको मैं सस्ते में दे दूंगा। बोलिए कितनी लकड़ियां चाहिए। 

लेकिन उन दोनों मित्रों के पास लकड़हारे को देने के लिए कुछ नहीं था। अधीर ने कहा, हमारे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है। तो लकड़हारा ने उन्हें लकडि़यां देने से इनकार कर दिया। दोनों मित्र निराश होकर फिर से आगे बढ़ने लगे। अचानक अधीर ने पीछे मुड़कर देखा तो लकड़हारा लकड़ियों का गट्ठर रास्ते में रखकर पानी पीने के लिए जा रहा था। उसके मन में लालच आ गया। उसने अभय से कहा, देखो अगर हम लकड़हारे की लकड़ियां चुरा लें तो हमारा काम हो जाएगा। लेकिन अभय को यह मंजूर नहीं था और उसने इनकार कर दिया। अधीर ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और लकड़हारे की लकड़ियां लेकर जंगल में भाग गया।

अधीर की इस कुकृत्य पर अभय को बहुत गुस्सा आया, मगर वह कंटक पहाड़ी की तरफ आगे बढ़ गया। पहाड़ी पर पहुंचकर जब उसने पीछे देखा तो दूर–दूर तक केवल घना जंगल दिखाई दे रहा था। अभय ने झट से सूखी लकड़ियां इकट्ठी की और एक गट्ठर बनाया। उसे अंधेरा होने से पहले–पहले जंगल से निकलना था क्योंकि रात्रि में जंगल में जंगली जानवरों का भय रहता है। रात होते-होते वह आश्रम पहुंच गया। वहां आमोद, अधीर दोनों आश्रम के बाहर उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने अभय को बताया कि गुरुजी ने उसके इंतजार में उन दोनों को भी अंदर आने नहीं दिया है। 

अभय को साथ लेकर आमोद और अधीर आश्रम में आ गए। रात काफी हो चुकी थी अतः आचार्य ने तीनों को लकड़ियां रखकर सो जाने को कहा। तीनों मित्र अपनी–अपनी लकड़ियां अपने सिरहाने रखकर सो गए। जब सुबह उठे तो उनके सिरहाने से लकड़ियां गायब थीं। तीनों को इस बारे में कुछ नहीं पता था। तीनों आचार्य के पास गए, उन्होंने देखा लकड़ियों का एक बड़ा ढेर आचार्य के सामने पड़ा था। आचार्य ने कहा, तुम लोग इसमें से अपनी सूखी लकड़ियां निकाल लो।

सबसे पहले आमोद गया। उसकी लकड़ियां हल्की गीली थी क्योंकि वह जंगल से काटकर लाया था अतः उसने अपनी लकड़ियां न लेकर उतनी ही सूखी लकड़ियां निकाल लीं। उसके बाद अधीर की बारी आई। वह लकड़ियां चुराकर लाया था इसलिए उसे अपनी लकड़ियों की कोई पहचान नहीं थी। उसने अभय को पहले लकडि़यां निकलने को कहा। अभय ने अपनी लकड़ियां चुनना शुरू किया तो उसकी दो लकड़ियां कम निकलीं। उसने आचार्य से कहा, मेरे गट्ठर से दो लकड़ियां कम हैं।

आचार्य ने कहा, आमोद का गट्ठर में देखो। अभय ने आमोद का गट्ठर देखा और उसे उसकी दो लकड़ियां मिल गई।

अब फिर से बारी थी अधीर की। अधीर असमंजस में था कि कौनसी लकड़ियां चुने। उसने जैसे–तैसे कुछ लकड़ियां चुन लीं।

अब आचार्य बोले, आमोद सच बताना! तुमने अभय के गट्ठर की दो लकड़ियां क्यों ली ? आमोद ने कहा, गुरुदेव! मैं लकड़ियां पास के जंगल से काटकर लाया था जो पूरी तरह से सुखी हुई नहीं थी। इसलिए मैंने सूखी लकड़ियां निकाल लीं। किन्तु मुझे नहीं पता था कि वह अभय की निकलेगी। आचार्य बोले, तुम नहीं जानते जंगल से लकड़ियां काटना राजद्रोह है? आमोद सिर झुकाते हुए, पता था गुरुदेव ! मुझे क्षमा कर दीजिए!

अब आचार्य अधीर से बोले, सच बताना अधीर ! जो लकड़ियां तुमने चुनी हैं! क्या वह तुम्हारी ही हैं? अधीर ने कहा, आचार्य मुझे अपनी लकड़ियों की कोई पहचान नहीं। क्योंकि मैं एक लकड़हारे की लकड़ियां चोरी करके लाया हूं। उन्होंने कहा कि मैं एक चोर को अपना शिष्य स्वीकार नहीं कर सकता हूं।  

इसके बाद आचार्य ने अभय से कहा, तुम्हे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। जो अपनी दो लकड़ियां पहचान सकता है, वह निश्चय ही बड़ी मेहनत से लाया होगा। लाओ अपनी समिधाएँ यज्ञ के पास रख दो। आज से तुम मेरे शिष्य हो।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है

जो लाइफ में शॉर्टकट अपनाते है उनकी लाइफ अक्सर शोर्ट हो जाती है। इसलिए शॉर्टकट से सावधान रहे और ईमानदारी पूर्वक जिए और जीने दे। जीवन में धैर्य रखे और ईश्वर में विश्वास रखे। ईमानदारी से किया गया कर्म कभी व्यर्थ नहीं होता।

मेहनत से कभी घबराना नहीं चाहिए। सच्चाई और मेहनत से अपने रास्ते पर चलने वाले लोगों को थोड़ी परेशानी उठाने पड़ सकती है, मगर उन्हें अपने रास्ते से कोई हटा नहीं सकता है।

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  • Web Title:People choosing shortcut to reach heights won t stay for long