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22 अप्रैल, 2021|4:55|IST

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Paush Purnima 2021: पौष पूर्णिमा के दिन क्यों की जाती है मां दुर्गा के शाकंभरी स्वरूप की पूजा, पढ़ें पौराणिक कथाएं

शास्त्रों में पौष पूर्णिमा का विशेष महत्व बताया गया है। पौष मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को पौष पूर्णिमा कहते हैं। इस बार पौष पूर्णिमा 28 जनवरी 2021 को है। इस दिन दान, जप और तप का विशेष महत्व होता है। इस साल पूर्णिमा पर गुरुपुष्य योग बनने पर इसका महत्व और बढ़ गया है। पौष पूर्णिमा को शांकभरी पूर्णिमा भी कहते हैं। 

पौष मास की पूर्णिमा के दिन ही मां दुर्गा ने अपने भक्तों के कल्याण के लिए माता शांकभरी का अवतार लिया था। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन मां दुर्गा ने पृथ्वी पर अकाल और गंभीर खाद्य संकट से भक्तों को निजात दिलाने के लिए शांकभरी का रूप लिया था। इसलिए इन्हें सब्जियों और फलों की देवी माना जाता है। इसलिए इस पूर्णिमा को शांकभरी पू्र्णिमा के नाम से भी जानते हैं। पौष पूर्णिमा के दिन मां दुर्गा की पूजा का भी विधान है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इस दिन को छेरता पर्व मनाते हैं।

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शांकभरी पूर्णिमा से जुड़ी मान्यता-

मान्यता है कि पौष पूर्णिमा के दिन गरीब या जरुरतमंद को अन्न, शाक (कच्ची सब्जी) फल व जल का दान देने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। मां दुर्गा की कृपा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

 पौष पूर्णिमा पर स्नान मुहूर्त- 

 उत्थान ज्योतिष संस्थान के निदेशक ज्योतिर्विद पं. दिवाकर त्रिपाठी पूर्वांचली के अनुसार पूर्णिमा तिथि 27 जनवरी, बुधवार की रात में 12:32 बजे से शुरू हो जाएगी जो 28 जनवरी को रात 12:32 बजे तक रहेगी। इसलिए गुरुवार को ब्रह्म मुहूर्त से ही स्नान दान शुरू हो जाएगा।

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पौराणिक कथाएं-

पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, एक समय जब पृथ्‍वी पर दुर्गम नामक दैत्य ने आतंक का माहौल पैदा किया। इस तरह करीब सौ वर्ष तक वर्षा न होने के कारण अन्न-जल के अभाव में भयंकर सूखा पड़ा, जिससे लोग मर रहे थे। जीवन खत्म हो रहा था। उस दैत्य ने ब्रह्माजी से चारों वेद चुरा लिए थे। तब आदिशक्ति मां दुर्गा का रूप मां शाकंभरी देवी में अवतरित हुई, जिनके सौ नेत्र थे। उन्होंने रोना शुरू किया, रोने पर आंसू निकले और इस तरह पूरी धरती में जल का प्रवाह हो गया। अंत में मां शाकंभरी दुर्गम दैत्य का अंत कर दिया।

ये कथा भी है प्रचलित-

एक अन्य कथा के अनुसार शाकंभरी देवी ने 100 वर्षों तक तप किया था और महीने के अंत में एक बार शाकाहारी भोजन कर तप किया था। ऐसी निर्जीव जगह जहां पर 100 वर्ष तक पानी भी नहीं था, वहां पर पेड़-पौधे उत्पन्न हो गए। यहां पर साधु-संत माता का चमत्कार देखने के लिए आए और उन्हें शाकाहारी भोजन दिया गया। इसका तात्पर्य यह था कि माता केवल शाकाहारी भोजन का भोग ग्रहण करती हैं और इस घटना के बाद से माता का नाम शाकंभरी माता पड़ा। 

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  • Web Title:Paush Purnima 2021 Why We Celebrate Shakambhari Jayanti on Paush Purnima Know here Importance Subh Muhurat and Katha