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15 अप्रैल, 2021|7:12|IST

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पौष पूर्णिमा 2021: कल संगम पर शुरू होगा कल्पवास, की जाती है तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजा

maghi purnima 5th snan of kalpwas on sunday

वैश्विक महामारी कोविड़-19 के बीच माघ मेला में पौष  पूर्णिमा के पावन पर्व से कल्पवासी संगम में आस्था की डुबकी के साथ ही  विस्तीर्ण रेती पर संयम, अहिंसा, श्रद्धा एवं कायाशोधन के लिए  कल्पवास शुरू करेंगे। कुछ कल्पवासी मकर संक्रांति से माघ शुक्ल  की संक्रांति तक कल्पवास करते हैं जबकि 90 से 95 फीसदी कल्पवासी पौष  पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक कल्पवास करते हैं। मकर संक्रांति से माघ  शुक्ल की संक्रांति तक कल्पवास करने वालो में मैथिल के साथ बिहार और बंगाल  के श्रद्धालुओं के साथ कुछ साधु संत शामिल होते हैं।  पौष पूर्णिमा पर  प्रयागराज माघ मेला का गुरुवार को दूसरा बड़ा स्नान पर्व है। हालांकि इस  स्नान पर्व से संगम में स्नान करने के साथ त्याग-तपस्या का प्रतीक कल्पवास  आरंभ हो रहा है। देशभर के गृहस्थ संगम तट पर तंबुओं में रहकर माह भर  भजन-कीर्तन करना शुरू करेंगे। मोक्ष की आस में संतों के सानिध्य में समय  व्यतीत करेंगे। सुख-सुविधाओं का त्याग करके दिन में एक बार भोजन और तीन बार  गंगा स्नान करके तपस्वी का जीवन व्यतीत करेंगे।

उन्होंने बताया कि आदिकाल से चली आ रही  इस  परंपरा के महत्व की चर्चा वेदों से लेकर महाभारत और रामचरित मानस में   अलग-अलग नामों से मिलती है। बदलते समय के अनुरूप कल्पवास करने वालों के   तौर-तरीके में कुछ बदलाव जरूर आए हैं लेकिन कल्पवास करने वालों की संख्या   में कमी नहीं आई है। आज भी श्रद्धालु भयंकर सर्दी में कम से कम संसाधनों  की  सहायता लेकर संगम में कल्पवास करने पहुंचते हैं।   कल्पवास के  पहले शिविर के मुहाने पर तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजा आवश्य की  जाती है। कल्पवासी अपने घर के बाहर जौ का बीज अवश्य रोपित करता है। कल्पवास  समाप्त होने पर तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर देते हैं और शेष को अपने  साथ ले जाते हैं। कल्पवास के दौरान कल्पवासी को जमीन पर रात्रि विश्राम  करना होता है। इस दौरान फलाहार या एक समय निराहार रहने का प्रावधान होता  है। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियम पूर्वक तीन समय गंगा में स्नान और  यथासंभव अपने शिविर में भजन-कीर्तन, प्रवचन या गीता पाठ करना चाहिए।

माघ मेला  बसाने वाले प्रयागवाल सभा के महामंत्री राजेन्द्र पालीवाल ने कहा कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान से पिछले वर्ष की तुलना में  लगभग कल्पवासी मेला क्षेत्र में पहुंच चुके है। यहां पर वे संयम, अहिंसा,  श्रद्धा एवं कायाशोधन का एक मास का कल्पवास करेंगे।  पालीवाल  ने बताया कि पुराणों और धर्मशास्त्रों में कल्पवास को आत्मा की शुद्धि और  आध्यात्मिक उन्नति के लिए जरूरी बताया गया है। यह मनुष्य के लिए आध्यात्म  की राह का एक पड़ाव है। इस दौरान स्वनियंत्रण एवं आत्मशुद्धि का प्रयास किया  जाता है। कल्पवासी भौतिक सुखों का त्यागकर मोक्ष की कामना से एक महीने तक  संगम गंगा तट पर तीन समय स्नान, रेती पर रात्रि विश्राम, अल्पाहार ध्यान  एवं दान के साथ कल्पवास का कठोर तपस्या करते है। कल्पवास का जिक्र वेदों और पुराणों में भी मिलता है। हालांकि  कल्पवास कोई आसान प्रक्रिया नहीं है। यह मोक्षदायनी विधि की एक कठिन  साधना है। इसमें पूरे नियंत्रण और संयम का अभ्यस्त होने की आवश्यकता होती  है। पद्म पुराण में इसका जिक्र करते हुए महर्षि दत्तात्रेय ने कल्पवास के  नियमों के बारे में विस्तार से चर्चा की है। माना जाता है कि कल्पवास  का पालन करके अंत:करण और शरीर दोनों का कायाकल्प हो सकता है।
आचार्य गौतम ने बताया कि महाभारत के एक प्रसंग में मार्कंडेय धर्मराज  युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजन तीर्थराज प्रयाग सब पापों को नाश करने वाला  है। जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक महीना इंद्रियों को वश में करके स्नान,  ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है। कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है। कल्पवास के नियम हजारों सालों से चला आ रहा है। जब इलाहाबाद तीर्थराज प्रयाग कहलाता था और यह आज  की तरह विशाल शहर न/न होकर ऋषियों को तपस्थली माना जाता था। यहां गंगा और  यमुना के आसण्पास घना जंगल था। इस जंगल में ऋषिण्मुनि ध्यान और तप करते थे।  ऋषियों ने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा।
 उन्होंने बताया  कि कल्पवास के नियम के अनुसार जब गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आता है, वह  पत्तों और घास-फूस की बनी कुटिया में रहता था जिसे उसे पर्ण कुटी कहा जाता  था। इस दौरान एकबार ही भोजन किया जाता है और मानसिक रूप से धैर्य, अहिंसा  और भक्तिभव का पालन किया जाता है। कल्पवासी सुबह की शुरूआत गंगा स्नान से  करते हैं। उसके बाद देर रात तक भजन  कीर्तन चलता रहता है। करीब दो महीने से अधिक का समय सांसारिक भागदौड़ से  दूर तन और मन को नयी स्फूर्ति देने वाला होता है।

शास्त्रों के अनुसार कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन  महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर भी कल्पवास किया जा सकता है।  संगम तट पर  निवास करते हुए कल्पवासी जप, तप, ध्यान, साधना, यज्ञ एवं दान  आदि विविध प्रकार के  धार्मिक कृत्य करते हैं। कल्पवास का वास्तविक अर्थ है  कायाकल्प। यह कायाकल्प शरीर और अन्त:करण दोनों का होना चाहिए। इसी   द्विविध कायाकल्प के लिए पवित्र संगम तट पर जो एक महीने का वास किया जाता   है जिसे कल्पवास कहा जाता है।
        आचार्य गौतम ने बताया कि  प्रतिवर्ष माघ मास मे जब सूर्य मकर राशि मे रहते हैं। तब माघ मेला एवं  कल्पवास का आयोजन होता है। महाभारत के अनुसार सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण  किए तपस्या करने के फल बराबर पुण्य माघ मास में कल्पवास करने से ही प्राप्त  हो जाता है।
 

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  • Web Title:Paush Purnima 2021: Kalpavas to begin tomorrow at Sangam Tulsi and Shaligram are established and worshiped