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ईश्वर की इच्छा में ही हमारी खुशी होनी चाहिए

इस संसार के सभी प्राणी इच्छा रखते हैं। यह मानवीय स्वभाव है। इन इच्छाओं के पूरा न होने पर हम दुखी हो जाते हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि जब हमारी इच्छा पूरी नहीं होती तो वह ईश्वर की इच्छा होती है, जो

ईश्वर की इच्छा में ही हमारी खुशी होनी चाहिए
Saumya Tiwariश्री श्रीपरमहंस योगानंद,नई दिल्लीWed, 29 Nov 2023 05:30 PM
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मानवजाति एक विशाल चिड़ियाघर के समान है। यहां इतने सारे लोग इतने भिन्न-भिन्न प्रकार का आचरण करते हैं, जिनमें से अधिकांश लोगों का अपने ऊपर कोई नियंत्रण नहीं होता। अपने जीवन का सच्चा लक्ष्य प्राप्त करने से पहले मनुष्य को आत्मसंयम प्राप्त करना आवश्यक है। उसे संतुलन स्थापित करने का प्रयास करना आवश्यक है। इसके लिए प्रयासरत रहें और एक बार जब वह प्राप्त हो जाए तो इसे कभी न खोएं। जब सलीब पर क्राइस्ट को कीलें ठोकी जा रही थीं, तब भी उन्होंने इसे खोया नहीं। उन्होंने कहा, ‘हे परमपिता, इन्हें क्षमा कर दो, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।’ साधारण मनुष्य ऐसी परीक्षाओं का सामना नहीं कर सकता।

जब मैंने आध्यात्मिक पथ पर कदम रखा था, मैंने सोचा था कि मेरे साथ सब अच्छा ही होगा; पर मैंने देखा कि अनेक कठिन परिस्थितियां भी आईं। तब मैंने यह कहकर अपने आपको समझाया, ‘क्योंकि मैं ईश्वर से इतना गहन प्रेम करता हूं, इसलिए मैंने उनसे कुछ अधिक ही अपेक्षाएं की हैं।’ परंतु अब से आगे मैं सदा यही कहूंगा, ‘प्रभो! आपकी इच्छा पूर्ण हो।’ गंभीर परीक्षाएं आईं। लेकिन मैं इसी विचार पर स्थिर रहा, ‘आपकी ही इच्छा पूर्ण हो।’ वे मुझे जो भी दे रहे थे, उसी को मैं मन से स्वीकार करना चाहता था। और ईश्वर ने सदा ही मुझे यह दिखाया कि हर परीक्षा में किस तरह मैं विजयी हो सकता हूं।

आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति के लिए मृत्यु भी कुछ नहीं है। मैंने एक बार स्वप्न देखा कि मैं मर रहा हूं। परंतु फिर भी मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था, ‘प्रभो! ठीक है; आपकी जो इच्छा।’ तब उन्होंने मुझे स्पर्श किया और मुझे इस सत्य का ज्ञान हुआ,‘मैं कैसे मर सकता हूं? लहर कभी नहीं मरती; वह तो केवल सागर में समा जाती है और फिर ऊपर आती है। लहर कभी नहीं मरती; और मैं भी कभी नहीं मर सकता।’

जब आप किसी कपड़े की दुकान पर जाते हैं, तो आप वह वस्त्र लेने का प्रयास करते हैं, जो आपके अनुकूल हो और जो आपके व्यक्तित्व को निखारता हो। आपको अपनी आत्मा के लिए भी ऐसा ही करना चाहिए। आत्मा की कोई विशेष पोशाक नहीं होती; यह जो वेश चाहती है, वही धारण कर सकती है। शरीर की सीमाएं हैं, किंतु आत्मा किसी भी प्रकार की मानसिक पोशाक, किसी भी प्रकार के व्यक्तित्व को धारण कर सकती है।

यदि आप किसी व्यक्ति के बारे में गहनता से सोचें, उसके इतिहास का अध्ययन करें, और उसके व्यक्तित्व की सचेतन रूप से नकल करें, तो आप उस जैसा बनने लग जाएंगे; और उस व्यक्तित्व के साथ अपनी एकरूपता स्थापित कर लेंगे। मैंने इसका अभ्यास किया है और मैं जिस भी व्यक्तित्व को चाहूं धारण कर सकता हूं। जब मैं ज्ञान रूपी व्यक्तित्व को धारण करता हूं तो ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ नहीं बोल सकता। जब प्रभु के महान भक्त, श्रीचैतन्य के व्यक्तित्व को धारण करता हूं, तो मैं भक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं बोल सकता। और जब मैं जीसस के व्यक्तित्व के साथ अंतर्संपर्क कर लेता हूं तो ईश्वर के विषय में जगन्माता के रूप में नहीं बोल सकता— बल्कि केवल परमपिता के रूप में बोल सकता हूं, जैसा कि वे बोलते थे। आत्मा कोई भी मानसिक वेशभूषा, जिसकी वह प्रशंसा करती है या इच्छा करती है, धारण कर सकती है और जब भी वह चाहे अपनी इच्छा अनुरूप वही वेशभूषा बदल सकती है।

जब आप किसी बहुत अच्छे व्यक्ति से मिलते हैं, तो क्या ऐसा नहीं चाहते कि आप भी उस जैसे होते? उन सब उत्कृष्ट गुणों के बारे में सोचें जो महान पुरुषों और स्त्रियों के हृदयों में हैं; आप भी उन सभी गुणों को अपने हृदय में धारण कर सकते हैं। आप विनम्र और बलवान बन सकते हैं या उस जनरल की तरह बहादुर बन सकते हैं, जो एक न्यायसंगत कारण के लिए लड़ता है। आप संत फ्रांसिस की दैवी इच्छाशक्ति, प्रेम और समर्पण को प्राप्त कर सकते हैं।

चाहे कितनी ही बाधाएं क्यों न आएं, सर्वोपरि ईश्वर को खोजने की इच्छाशक्ति को अधिकाधिक बलवान बनाते जाएं। तब आप जीवन में विजयी होंगे। जब मैं इस कार्य के लिए कुछ करने का प्रयास कर रहा होता हूं, और उसमें कई बाधाएं आती हैं, तो मन में कभी-कभी विचार आता है, ‘मुझे यह सब करने की क्या जरूरत है? मैंने तो ईश्वर को प्राप्त कर लिया है। मुझे अपने लिए इनकी कोई आवश्यकता नहीं।’ परंतु तब मैं प्रभु से कहता हूं, ‘जो कुछ मेरे साथ होगा, मैं उसे स्वीकार करूंगा। लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं, मुझे उसकी परवाह नहीं क्योंकि वे एक दिन मेरे साथ हैं, दूसरे दिन मेरे विरोध में हो जाते हैं। आपकी प्रसन्नता में ही मेरी प्रसन्नता है।’

प्रत्येक मानव अद्वितीय है; कोई भी दो मानव पूरी तरह एक समान नहीं हो सकते। अपने बारे में ऐसा सोचें, ‘मेरा व्यक्तित्व ईश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है। मैं अपने दैवी व्यक्तित्व पर गर्व करूंगा। मैं अपने आप में सुधार लाऊंगा और एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व को धारण करूंगा।’ यदि आप अपनी भूमिका ठीक ढंग से निभाएंगे तो आप उस आत्मा के समान ही हैं, जो एक राजा या रानी की भूमिका निभाती है। और जब तक आप अपनी भूमिका ठीक ढंग से निभाते रहेंगे, तब तक आपको सब प्रेम करेंगे और आप आकर्षक बने रहेंगे।

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