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6 जुलाई, 2020|3:12|IST

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देवी महिमा: सब कुछ समाहित है भगवती में

नवरात्रि

ऐसे तो महामाया की आराधना के कितने ही आधार तत्व वेद-पुराण, स्मृति व उपनिषद् आदि ग्रंथों में हैं, लेकिन इन सब में श्री दुर्गा सप्तशती का विशेष मान है। इसे मातृ आराधना का का सेतु कहा गया है। दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय से मातृ महिमा का विशद् वर्णन है और ज्ञात होता है कि कोटि-कोटि देवताओं के दिव्यांश से मातृ देवी की उत्पत्ति हुई है। 

यही कारण है कि शक्ति, बल, शौर्य व महिमा में मां का नाम सबसे ऊपर है। देवी जी का मुख शिवशंकर के तेज से, सिर में बाल यमराज के तेज से, भुजाएं श्री विष्णु के तेज से, दोनों चरण ब्रrा के तेज से और अंगुलियां सूर्य के तेज से प्रकट हुईं। हाथों की अंगुलियां वसुओं के तेज से, नासिका कुबेर के तेज से, दंत प्रजापति के तेज से, तीनों नेत्र अग्नि के तेज से, भवें संध्या के तेज से और कान वायु के तेज से प्रकट हुए।शरीर के बाद वस्त्र-आभूषण और श्रृंगार की चर्चा आई है।

भगवान शिव से शूल, विष्णु से चक्र, वरुण से शंख, अग्नि से शक्ति, वायु से धनुष व वाण भरे दो तरकश, इंद्र से वज्र और घंटा, यमराज से दंड, वरुण से पाश, प्रजापति से स्फटिकाक्ष की माला जी से कमंडल प्राप्त हुआ। सूर्यदेव ने उनके रोमकूपों में किरणों का तेज भर दिया तो काल देवता ने उन्हें चमकती हुई ढाल व तलवार प्रदान की। 

क्षीरसमुद्र ने हार और सदैव नवीन रहने वाले द्वय वस्त्र प्रदान किए, कुंडल, कड़ा, नुपूर, हंसली व अंगूठियों से उन्हें श्रृंगारित किया। विश्वकर्मा ने निर्मल फरसा, अस्त्र व अभेद्य कवच तो जलधि ने सुंदर फूलों की मालाएं दीं। कुबेर ने मधु से भरा पात्र तो शेषनाग ने नागहार प्रदान किया।

इस प्रकार मां दुर्गा सभी देवी-देवताओं के अंश से उत्पन्न और श्रृंगारित हैं। तभी तो वे सभी देवगणों में सर्वाधिक बलशाली हैं। देवी पुराण में अंकित है कि एकमेव देवी की आराधना से सभी देवता प्रसन्न होते हैं। सचमुच देवी परम कल्याणकारी व महाशक्ति स्वामिनी हैं, जिनकी कृपा से हरेक कार्य सहज व रूरल रूप से सम्पन्न हो जाता है।    

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  • Web Title:Navratri 2017: everything is in Maa Bhagwati