Hindi Newsधर्म न्यूज़Muqaddas Ramadan Freedom from the world with Rahmat and Magafirat

मुकद्दस रमजान : रहमत और मगफिरत के साथ जहन्नुम से आजादी

रमजान का महीना वाकई बेशुमार बरकतों वाला होता है। इस मुकद्दस महीने के तीन अशरे (हिस्से) होते हैं। इनमें रोजदार पर अल्लाहतआला की रहमत बरसती है। गुनाह माफ हो जाते हैं। जहनुन्न से आजादी मिलती है। इसी तरह...

ramzan
Yuvraj लाइव हिन्दुस्तान टीम, मेरठ Sun, 26 April 2020 02:21 AM
हमें फॉलो करें

रमजान का महीना वाकई बेशुमार बरकतों वाला होता है। इस मुकद्दस महीने के तीन अशरे (हिस्से) होते हैं। इनमें रोजदार पर अल्लाहतआला की रहमत बरसती है। गुनाह माफ हो जाते हैं। जहनुन्न से आजादी मिलती है। इसी तरह से अल्लाह के नेक बंदे खुद को इस महीने में इबादत करते हुए जन्नत के हकदार बना लेते हैं।

कारी आफताब के अनुसार माह -ए-रमजान का पहला अशरा रहमत का होता है, तो दूसरा अशरा मगफिरत का होता है, जबकि रमजान के महीने का अंतिम और तीसरा अशरा जहन्नुम से आजादी का होता है। अंतिम अशरे में अल्लाह अपने बंदों को जहन्नुम से आजादी देता है। अब पहले दस दिन रहमत के अशरे में शामिल हैं। मुसलमानों को रोजा रखने के साथ तिलावत-ए-कलाम पाक और तरावीह की नमाज भी पाबंदी के साथ मुकम्मल करनी चाहिए। इसमें अल्लाह अपने बंदों पर रहमत की बारिश करता है। यानि दस दिन तक अल्लाह की बेशुमार रहमतें बंदों पर नाजिल होती हैं।

दूसरा अशरा मगफिरत का है, इस अशरे में अल्लाह मरहूमों की मगफिरत फरमाता है तथा रोजेदारों को उनके गुनाहों से आजाद करता है। कारी आफताब बताते हैं कि मुकद्दस महीने के बीच के दस दिन में अल्लाह पाक जितने भी मरहूम हैं उनकी मगफिरत फरमाता है तथा रोजेदार बंदों के सारे गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। यानि दूसरे अशरे में अल्लाह से गुनाहों की माफी मांगी जाए तो वह कबूल होती है।

तीसरा अशरा जहन्नुम से आजादी का होता है। तीसरे अशरे में अल्लाह अपने बंदों को जहन्नुम से निजात देता है। मुकद्दस महीने में मुसलमानों को रोजा रखने के साथ-साथ पांचों वक्त की नमाज व तरावीह पढ़नी चाहिए ताकि अल्लाह की बेशुमार नेमत हासिल कर जन्नत का हकदार बना जा सके।

दारुल उलूम देवबंद की हिदायतें
-अगर कोई किसी बीमारी में ग्रस्त है तो रोजा छोड़ सकता है। रोजा छोड़ने के लिए किसी मुफ्ती से मसला जरूर मालूम कर लें।
-लॉकडाउन के चलते जुमा की नमाज सहित अन्य नमाजों, तरावीह को भी घरों में ही अदा करें।
- मस्जिदों में शासन और स्वास्थ्य विभाग की हिदायतों पर अमल करना चाहिए।
- मस्जिदों में वहीं लोग नमाज और तराबीह अदा करें, जिन्हें इजाजत मिली हुई है।
- रोजे में सहरी और इफ्तार अपने-अपने क्षेत्रों की जंतरी के हिसाब से करें।
- लॉक डाउन के चलते इफ्तार पार्टी और मस्जिदों में इफ्तार से बचें।

 

ऐप पर पढ़ें