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10 दिसंबर, 2019|1:28|IST

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Mokshada Ekadashi 2019: इस तारीख को है मोक्षदा एकादशी व्रत, मोक्ष प्राप्ति के लिए रखा जाता है व्रत

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हिंदू धर्म में माना जाता है कि मोक्ष प्राप्त किए बिना मनुष्य को बार-बार इस संसार में आना पड़ता है। मोक्ष की इच्छा रखने वाले प्राणियों के लिए मोक्षदा एकादशी व्रत रखने की सलाह दी गई है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। मोक्षदा एकादशी पर सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें। भगवान विष्णु की आराधना करें।

पूजा में तुलसी के पत्तों को अवश्य शामिल करें। रात्रि में भगवान श्रीहरि का भजन-कीर्तन करें। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा देकर विदा करें। उपवास को परिवार के साथ खोलना चाहिए। मोक्षदा एकादशी से एक दिन पहले दशमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए तथा सोने से पहले भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। उपवास रखकर श्री हरि के नाम का संकीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करें। प्राणियों को बंधन से मुक्ति प्रदान करने वाली यह एकादशी समस्त कामनाओं को पूर्ण करती है। 

सबसे पुण्यकारी है यह व्रत : मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी के रूप में जाना जाता है। इस दिन ही कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश दिया था। यह तिथि गीता जयंती के नाम से भी जानी जाती है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस व्रत को सबसे पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करें तथा प्रतिदिन गीता अवश्य पढ़ें।
नरक से स्वर्ग पहुंच जाते हैं पूर्वज :  इस व्रत में विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करें और भगवान विष्णु की आरती करें। ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को दान दें। मान्यता है कि मोक्षदा एकादशी व्रत करने से व्रती के पूर्वज जो नरक में चले गए हैं, उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। 

अंधकार में प्रकाश-पुंज है गीता : मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष एकादशी श्री गीता जयंती के रूप में भी मनाई जाती है। इस दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था। चूंकि गीता स्वयं श्री भगवान के द्वारा गाई गई है, इसलिए इसका नाम श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता दिव्यतम ग्रंथ है, जो महाभारत के भीष्म पर्व में है। श्री वेदव्यास जी ने महाभारत में गीताजी के माहात्म्य को बताते हुए कहा है, ‘गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्र विस्तरै:। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि: सृता।।’ अर्थात् गीता सुगीता करने योग्य है। गीताजी को भली-भांति पढ़ कर अर्थ व भाव सहित अन्त:करण में धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है। गीता स्वयं विष्णु भगवान् के मुखार्रंवद से निकली हुई है। फिर अन्य बहुत से शास्त्रों के संग्रह करने की क्या आवश्यकता है?
गीता उपनिषदों की भी उपनिषद है। यही कारण है कि गीता में मानव को अपनी समस्त समस्याओं का समाधान मिल जाता है। गीता के स्वाध्याय से श्रेय और प्रेय दोनों की प्राप्ति हो जाती है। भगवान् श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट कहा है, ‘यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धु्रवा नीतिर्मतिर्मम:॥’ अर्थात् जहां श्री योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, जहां धनुर्धर अर्जुन हैं और जहां अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं, वहां श्री, विजय और विभूति हैं। भगवान का वचन है कि इस गीताशास्त्र को जो कोई पढ़ेगा अर्थात् इसका पाठ करेगा, इसका विस्तार करेगा, उसके द्वारा मैं निस्संदेह ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊंगा। ‘नाशयाम्यात्मभावस्था ज्ञानदीपेन भास्वता’ अर्थात् मैं स्वयं ही उनके अज्ञान जनित अंधकार को प्रकाशमय तत्व, ज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूं। कहना न होगा, गीता एक प्रकाश-पुंज है। 

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