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कई मायने में खास है मोहर्रम का महीना

मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है। इस्लामी वर्ष में यह रमजान के बाद सबसे पाक महीना माना जाता है। अरबी तारीखों के अनुसार इस महीने की दसवीं तारीख को यौम-ए-आशुरा कहते हैं। इसी दिन हजरत इमाम हुसैन रजि. की शहादत हुई और हजरत इमाम हुसैन की शहादत से पहले ही इस्लाम में इस दिन की बड़ी फजीलत थी।

इस महीने में पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब को अपना जन्मस्थान मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा, जिसे हिजरत कहते हैं। उनके नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके परिवार वालों की शहादत इसी महीने में हुई। इसी महीने में मिस्र के जालिम शासक फिरऔन अपनी सेना समेत लाल सागर में समा गया था। इस महीने को नबी सल्ल. ने अल्लाह का महीना इरशाद फरमाया है।
इसी महीने अल्लाह ने दुनिया के पहले पैगंबर हजरत आदम अलै. को पैदा किया। अल्लाह ने पैगंबर हजरत मुसा अलै. को फिरऔन के जुल्म से निजात दी और पैगंबर मुसा अलै. ने अल्लाह के शुक्र में रोजा रखा। अरबी तारीखों के अनुसार इसी माह कयामत कायम होगी और वह जुमे का दिन होगा। शिया मुसलमानों में मोहर्रम की पहली तारीख से दस तारीख़ तक मातम किया जाता है और यौम-ए-आशुरा के दिन फाका किया जाता है। इस दौरान सोगवार चाकुओं, छुरियों से मातमपुर्सी करते है। नोहेख्वान नोहाख्वानी करते हैं। ऐसा करके उस दुख और उस गम को जानने, समझने, महसूस करने की कोशिश की जाती है, जो नबी के नवासे हज़रत हुसैन और उनके परिवार के लोगों ने महसूस किया। इतिहास में ये सारी घटना कर्बला के वाकये के नाम से जानी जाती है। मोहर्रम की दसवीं तारीख़ इस दुख की इंतहा का दिन है।

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  • Web Title:Moharram
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