Mithilanchal on Diwali worship of Rama and Sita with Lakshmi-Ganesh - मिथिला में हुक्का-लोली जलाकर मनती है दीपावली, मिथिलांचल में दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश के साथ होती है राम व सीता की पूजा DA Image

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मिथिला में हुक्का-लोली जलाकर मनती है दीपावली, मिथिलांचल में दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश के साथ होती है राम व सीता की पूजा

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मिथिलांचल में प्रकाश पर्व दीपावली का विशेष महत्व है। यहां इस दिन घर-घर लक्ष्मी व गणेश के साथ राम व सीता की भी पूजा की जाती है। सीता जी मिथिला की बेटी थी  और राम ने रावण को मारकर सीताजी को सकुशल अयोध्या लाया । इसको लेकर यहां दीपावली के दिन घर घर दीप जलाकर खुशियां मनाई जाती है। महिलाएं एक माह पूर्व से ही घरों की सफाई में लग जाती हैं। पूजा घर को सुंदर ढंग से सजाया जाता है।

मिथिला में दीपावली का त्योहार प्राचीन काल से ही पारंपरिक तरीके से मनाया जाता आ रहा है। कहा जाता है कि 14 वर्ष वनवास से भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में दिवाली मनाई जाती है। घर की साफ-सफाई और प्रकाश इसी उपलक्ष्य में किया जाता है। इसी परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए मिथिला में भी दीपोत्सव धूमधाम से मनाई जाती है । शिक्षाविद् डॉ. रामसेवक झा ने कहा कि मिथिलांचल में पटाखों की जगह हुक्का-लोली की परंपरा थी। दीपावली से एक दिन पहले बच्चे-युवा घर के फटे-पुराने कपड़ों का गोला बनाकर रात भर केरोसिन में डूबाकर रखते हैं। रात को उसे लंबे तार में बांधकर और आग लगाकर गोल-गोल घूमाते हैं, इसे ही  हुक्का-लोली कहा जाता है। पटाखा की जगह मिथिलांचल के गांवों में पहले यही होता था परंतु आधुनिकता के दौर में भी कुछ गांवों में हुक्का-लोली की परंपरा आज भी कायम है।

पुरखों को देते विदाई
मिथिलांचल में पुरखों की विदाई के लिए भी दीपावली पर्व मनाया जाता है। डॉ. रामसेवक झा बताते हैं कि महालया के बाद पितृपक्ष में पितरों का आगमन होता है व दीपावली की रात को उन्हें विदा किया जाता है। इसमें पटुआ की डंठल में खर बांधकर उसे दीप से जलाया जाता है।  फिर घर के हर कमरे में धान या सरसों छींटते हुए संठी को अंदर-बाहर किया जाता है। मान्यता है कि प्रकाश के माध्यम से पितर धरती से स्वर्ग की ओर चले जाते हैं। इसे उकाऊ-टीका या उल्का भ्रमण भी कहा जाता है ।
दीपावली रात महिलाएं संठी से पीटती हैं सूप
लक्ष्मी पूजा के बाद आधी रात को महिलाएं इसी संठी या डंठल से ब्रह्म मुहुर्त में गोल सूप को पीटती हैं। पीटते हुए कहती हैं अनधन लक्ष्मी घर आऊ, दरिद्र बहार जाऊ। मान्यता है कि ऐसा करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
चावल के आटे से बनता है दीया
मिथिलांचल में दीपावली के दिन मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा है। लेकिन लक्ष्मी पूजा के लिए यहां विशेष दीया बनाया जाता है। चावल के आटे से बने दीये से ही मिथिला में लक्ष्मी पूजा का विधान है। जो परंपरा आज भी विद्यमान है।
प्रदोष की अमावस्या को मनती दिवाली
मिथिला में दीपावली उसी दिन मनाई जाती है जिस दिन कार्तिक मास के कृष्णपक्ष के प्रदोष काल में अमावस्या पड़ता है। इस वर्ष ज्योति पर्व दीपावली सात अक्टूबर को है। अलबत्ता जो भी हो आधुनिकता में भी मिथिला की दीवाली अनोखी है।
 

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