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29 फरवरी, 2020|5:51|IST

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मकर संक्रांति 2020: यहां पुरुष करते हैं शिकार पर महिलाएं रखतीं हैं उपवास, जानें बेझा-बिंधा पर्व के क्या हैं नियम

makar sankranti 2020

मकर संक्रांति पर्व को झारखंड का आदिवासी समाज अलग-अलग तरीके से मनाता है। संताल परगना के सफाहोड़ सनातन धर्मावलंबी आदिवासी शिव और त्रिशूल की पूजा करते हैं तो बहुत से समाज सोहराय के अंतिम दिन नाच-गाने और भोज के साथ सकरात पर्व मनाते हैं। 

संताल और कोयलांचल के कुछ आदिवासी समुदाय के लोग शिकार पर निकलते हैं। बेझा-बिंधा पर्व के तहत शिकार पर जाने से लौटने तक महिलाएं घर में उपवास रखती हैं।

दो दिन चलने वाले वाले बेझा-बिंधा पर्व के पहले दिन मंगलवार को युवाओं के दल शिकार के लिए रवाना हो गए। शिकारियों के साथ में एक एक कुत्ता भी जाता है। 

इस शिकार की कई परंपराएं और नियम होते हैं। जब युवा शिकार पर निकल जाते हैं तो घर की महिलाएं न तो शृंगार करती हैं और न तो अन्न का दाना मुंह में डालती हैं। शिकारियों के वापस लौटने पर उसी शिकार का भोजन तैयार करती हैं और और व्रत तोड़ती है। गांव की टीमें खरगोश, पक्षी, जंगली सुअर आदि का शिकार करते हैं।

निशानेबाजी प्रतियोगिता-
इस अनोखे पर्व की शाम में या फिर अगले दिन आदिवासी समाज के युवाओं के बीच निशानेबाजी प्रतियोगिता का आयोजन होता है। समाज के रमेश टुडू बताते हैं कि आस-पास के गांवों के लोग मांझी हड़ाम के नेतृत्व में नगाड़ा, मांदर और ढोल के साथ नृत्य करते हुए सार्वजनिक स्थान पर जुटते हैं। 

यहां एक स्थान पर रेड़ी की डाल को गाड़ देते हैं। पहले इस डाल की पूजा होती है। इसके बाद शुरू होती है तीरंदाजी प्रतियोगिता। सबसे सटीक निशाना लगाने वाले युवा को श्रेष्ठ धनुर्धर घोषित किया जाता है। 

सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर को धोती, गंजी और पगड़ी पहना कंधे पर बैठाकर पूरे गांव में घुमाते हैं। इतना ही नहीं जिस जमीन पर यह प्रतियोगिेता होती है, उसे सालभर खेती करने के लिए उपहार में दे दिया जाता है।

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  • Web Title:Makar Sankranti 2020: Men hunt and women keep fasting here know what are the festival rules in jharkhand