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Makar Sankranti 2019: सत्य के संग क्रांति है मकर संक्रांति

makar sankranti 2019

सूर्य के उत्तरायण होते ही देवताओं का दिन व असुरों की रात्रि शुरू हो जाती है। इसीलिए उत्तरायण के पहले दिन मनाया जाने वाला मकर संक्रांति पर्व एक नई शुरुआत, नई गति का प्रतीक है। यह तेज, तप व वैराग्य का पर्व है। यह मन के अशुद्ध विचारों को त्याग कर पावन हो जाने का पर्व है।.

आनन्दमूर्ति गुरुमां
हड़ी की अग्नि जब प्रज्ज्वलित की जाती है, तो असल में यह एक यज्ञ होता है। जब लोहड़ी की अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है, तब उसमें पुरानी लकड़ी, समिधा, गुड़, काले या सफेद तिल, चिड़वा ऐसी विभिन्न चीजें डालते हैं। यज्ञ करते हुए जैसे हम उसमें समिधा, घी इत्यादि डालते हैं, उसी तरह लोहड़ी की अग्नि में भी हम ये सब पदार्थ डालते हैं। एक तरह से इससे वातावरण की शुद्धि होती है। अग्नि तो सब तरह की लकड़ी को स्वीकार कर उसको दहन कर देती है। वह लकड़ी चाहे कितनी गंदी, मैली, बेरंग, बेढंग हो, अग्नि के स्पर्श से, अग्नि के साथ मिलकर वह अग्निरूपा हो जाती है। उस समय अग्नि को साक्षी रख कर यह संकल्प करना चाहिए कि ‘मैं आज से अपने सभी दुष्कर्म, दुर्विचार, सभी कमजोरियां, कमियां, पाप, गलतियां इस अग्नि को अर्पित करता हूं।' अग्नि तेज देती है। उससे रोशनी और ताप दोनों मिलते हैं, इसलिए अग्नि हमारे अज्ञानरूपी अंधेरे में किए गये कमार्ें को लील जाती है, पी जाती है, सब कुछ खा जाती है और हमें देवत्व का प्रकाश, उम्मीद की रोशनी, आशा की ऊष्मा देती है।.

मकर संक्रांति का दिन, फसल काटने की शुरुआत के लिए मनाया जाने वाला उत्सव होता है। असम में यह उत्सव बिहू और दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से मनाया जाता है। इस तरह से नाम चाहे कुछ भी हो, पूरे भारत में यह दिन साल की नई शुरुआत का चिह्न होता है। ज्योतिष के अनुसार इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और इसी दिन से वर्ष का उत्तरायण पक्ष शुरू हो जाता है। उत्तरायण का काल छह महीने का होता है। इसे देवताओं का काल भी कहते हैं। दक्षिणायण में छह महीने देवता सोए हुए होते हैं और राक्षसों की तमोगुणी वृत्तियों का वर्चस्व होता है।.

चूंकि इस दिन से उत्तरायण शुरू होता है, तो इस समय में आप जो करना चाहते हो, पर अब तक नहीं कर सके, वह कर सकते हो। मकर राशि शनि की राशि है। आमतौर पर शनि को बुरा माना जाता है, पर सच यह है कि शनि तप देते हैं। किसी भी तपस्वी की ज्योतिष-कुंडली को आप देखो, तो उसमें शनि का स्थान बहुत अच्छा होता है। शनि के प्रभाव से वह व्यक्ति बहुत कठोर तप कर सकता है। शनि वैराग्य का *चिह्न हैं। शनि शिवांश माने शिवजी का अंश हैं और शनि सूर्यपुत्र भी हैं। जिसकी कुंडली में शनि का स्थान *बहुत अच्छा है, उसके जीवन में सूर्य जैसा तेज, तप और उज्ज्वलता आएगी। शिवजी जैसा तप, योग और वैराग्य उसके जीवन में होगा। जो चीज संसार के लिए बुरी है, वह अध्यात्म के लिए बड़ी अच्छी होती है। वैराग्य और तप जीवन में आए, इससे बढि़या और कुछ नहीं।.

अभी तो आपका सबसे बड़ा शत्रु आपका आलस्य है। आलस्य के कारण पौष महीने की सर्दी में सुबह रजाई से बाहर आना मुश्किल लगता है। गरम कपड़े पहन कर चुपचाप आग सेंकते बैठे रहना अच्छा लगता है। ऐसा व्यक्ति तप नहीं कर सकता। तप करने के लिए इन सारे गरम इंतजामों से बाहर आना पड़ेगा। शनि तप देते हैं, वैराग्य देते हैं। शनि ज्ञान के देवता हैं। शनि के प्रभाव से आपका मन धैर्य और संयम की ओर मुड़ता है। आपके मन में त्याग, वैराग्य, ज्ञान, सेवा और तप के विचार उठने लगते हैं। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना एक तपस्वी साधक के लिए विशेष मायने रखता है। जो लोग योगाभ्यास या प्राणायाम करना नहीं जानते हैं, वे संक्रांति के दिन तिल का दान, गुड़ का दान, गाय को चारा देना या गंगास्नान या त्रिवेणी स्नान करते हैं। पर असली स्नान तो ज्ञान का है। जिसने अपने मन के अंदर ही ज्ञान की गंगा को जागृत कर लिया है, उसे कहीं जाने की जरूरत नहीं होती। संत रैदास कहते हैं, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा'। मन चंगा हो तो इसी मन में ज्ञानरूपी गंगाजी प्रकट हो जाएंगी।.

संक्रांति माने सत्य के संग क्रांति, संत के संग क्रांति। जिनके जीवन में संत नहीं, उनके जीवन में कभी क्रांति नहीं होती। उनके जीवन में सिर्फ अशांति होती है। उनको तो दुनियावी वस्तुओं और व्यक्तियों से मोह होता है। मनचाही वस्तु या व्यक्ति मिले तो खुश होंगे, नहीं मिले तो रोते रहेंगे। पर जो संत के संग रहता है, वह यह बात जानता है कि खुशी पाने के लिए मुझे बाहर कुछ ढूंढ़ने की जरूरत है ही नहीं। मेरा आनंद तो मुझ में ही है, क्योंकि मैं तो ‘अस्ति भाति प्रियस्वरूप' हूं। यह देह मैं हूं नहीं, इसलिए देह का जन्म और मरण मेरा नहीं। देह के रोग और अशुद्धियां मेरी नहीं। मैं मन भी नहीं। इसलिए मन का पाप-पुण्य भी मैं नहीं, मेरे नहीं। मन की कमी-कमजोरी मैं नहीं, मेरी नहीं। मन के अशुद्ध विचार मैं नहीं, मेरे नहीं। मैं तो नित्यमुक्त, सच्चिदानंद, अनादि, अनंत, अद्वय, अनिर्वचनीय, विलक्षण स्वरूप हूं। संतसंगी तो आत्मतत्व के निश्चय में रहता है। वह जानता है कि बाहर संसार में दिखने वाली हर वस्तु मिथ्या है, बदलने वाली है। इसलिए बदलने वाली दुनियावी वस्तुओं के साथ वह अपने मन को नहीं जोड़ता। उसका मन आत्मतत्व का मनन करता है।.

मेरा आनंद तो मुझ में ही है, क्योंकि मैं तो ‘अस्ति भाति प्रियस्वरूप' हूं। यह देह मैं हूं नहीं, इसलिए देह का जन्म और मरण मेरा नहीं। देह के रोग और अशुद्धियां मेरी नहीं। मैं मन भी नहीं। इसलिए मन का पाप-पुण्य भी मैं नहीं, मेरे नहीं। मन की कमी-कमजोरी मैं नहीं, मेरी नहीं। मन के अशुद्ध विचार मैं नहीं, मेरे नहीं। मैं तो नित्यमुक्त, सच्चिदानंद, अनादि, अनंत, विलक्षण *स्वरूप हूं।.

मेरा आनंद तो मुझ में ही है, क्योंकि मैं तो ‘अस्ति भाति प्रियस्वरूप' हूं। यह देह मैं हूं नहीं, इसलिए देह का जन्म और मरण मेरा नहीं। देह के रोग और अशुद्धियां मेरी नहीं। मैं मन भी नहीं। इसलिए मन का पाप-पुण्य भी मैं नहीं, मेरे नहीं। मन की कमी-कमजोरी मैं नहीं, मेरी नहीं। मन के अशुद्ध विचार मैं नहीं, मेरे नहीं। मैं तो नित्यमुक्त, सच्चिदानंद, अनादि, अनंत, विलक्षण *स्वरूप हूं।.

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  • Web Title:Makar Sankranti 2019 15 january