Hindi Newsधर्म न्यूज़Mahashivratri 2021: Why is Tulsi not offered to Shiva or Why cant we offer Tulsi leaves to Shivling

महाशिवरात्रि 2021: शिवलिंग पर नहीं चढ़ाते हैं तुलसी, पढ़ें जालंधर नामक राक्षस से जुड़ी ये पौराणिक कथा

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त कई उपाय करते हैं। भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए शिवभक्त व्रत रखने के साथ ही भगवान को धतूरा, बेलपत्र आदि अर्पित करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि...

maha shivratri 2021
Saumya Tiwari लाइव हिन्दुस्तान टीम, नई दिल्लीWed, 10 March 2021 01:26 PM
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भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त कई उपाय करते हैं। भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए शिवभक्त व्रत रखने के साथ ही भगवान को धतूरा, बेलपत्र आदि अर्पित करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि  भगवान शिव की पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि पूजा में तुलसी के इस्तेमाल से भोलेनाथ नाराज हो सकते हैं। 

जानिए आखिर क्यों भगवान शिव को अर्पित नहीं की जाती है तुलसी-

पौराणिक कथा के अनुसार जालंधर नामक राक्षस भगवान शिव का अंश होने के बावजूद भी उनका दुश्मन था। उसे अपनी वीरता पर बड़ा अभिमान था। भगवान शिव का शत्रु होने से वह महादेव से युद्ध करके उनका स्थान प्राप्त करना चाहता है। माना जाता है कि अमर होने के लिए उसने वृंदा नाम की कन्या से विवाह करवाया। वृंदा ने पूरी जिदंगी पतिव्रता धर्म का पालन किया। इस कारण उसे सबसे पवित्र माना जाता है। जालंधर को विष्णु जी के कवच की वजह से अमर होने का वरदान मिला हुआ था।

मगर राक्षस जाति का होने से जालंधर देवताओं पर राज जमाना चाहता था। इसलिए उसने शिव जी को युद्ध करने की चुनौती दी। मगर वृंदा के पतिव्रता होने के कारण उसे मार पाना मुश्किल हो रहा था। इसके चलते भगवान शिव और विष्णु जी ने उसे मारने के लिए एक उपाय सोचा। सबसे पहले तो भगवान विष्णु से जालंधर कवच ले लिया। उसके बाद जालंधर की अनुपस्थिति में वृंदा की पवित्रता को भंग करने के लिए उनके महल में जालंधर का रूप धारण कर पहुंचे।

इसतरह वृंदा का पति धर्म भंग होते ही जालंधर का अमरतत्व का वरदान भी खत्म हो गया। इस तरह भगवान शिव ने उसे मार दिया। जब वृंदा को इस बात का पता चला कि उससे धोखा हुआ है तो उसने क्रोध में आकर भगवान शिव को श्राप दिया कि उनकी पूजा में कभी भी तुलसी की पत्तियां नहीं इस्तेमाल की जाएंगी। 

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एक अन्य कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में तुलसी का नाम वृंदा था और वह जालंधर नाम के राक्षस की पत्नी थी। वह राक्षस वृंदा पर काफी जुल्म करता था। जालंधर को सबक सिखाने के लिए भगवान शिव ने विष्णु भगवान से आग्रह किया। तब विष्णुजी ने छल से वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग कर दिया। बाद में जब वृंदा को यह पता चला कि भगवान विष्णु ने उनका पतिव्रत धर्म भंग किया है तो उन्होंने विष्णुजी को श्राप दिया कि आप पत्थर के बन जाओगे। तब विष्णु जी ने तुलसी को बताया कि मैं तुम्हारा जालंधर से बचाव कर रहा था, अब मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम लकड़ी की बन जाओ। इस श्राप के बाद वृंदा कालांतर में तुलसी का पौधा बन गईं।

(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

 


 

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