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25 जनवरी, 2021|7:53|IST

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भक्ति की राह पर चलने का संदेश देता है महर्षि वाल्मीकि का जीवन

अश्विन माह में पूर्णिमा का दिन महर्षि वाल्मीकि के प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है। त्रेता युग में जन्मे महर्षि वाल्मीकि की याद में इस दिन को वाल्मीकि जयंती के रूप में मनाया जाता है। उनका जीवन सद्कर्मों और भक्ति की राह पर चलने का संदेश देता है। कठोर तपस्या के बाद महर्षि वाल्मीकि ने महर्षि पद प्राप्त किया। परमपिता ब्रह्मा के कहने पर उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित रामायण महाकाव्य की रचना की।

महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि कहा गया है। उनका पूर्व नाम रत्नाकर था। नारद मुनि से मिलने के बाद उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वन में राम-राम जपने लगे। वर्षों तक कठोर तप के बाद उनके पूरे शरीर पर चींटियों ने बांबी बना ली, जिस कारण उनका नाम वाल्मीकि पड़ा। महर्षि वाल्मीकि ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के प्रकांड पंडित थे। वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता के साथ महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आए थे। महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण की रचना की और रामायण में चौबीस हज़ार श्लोक का निर्माण किया। लव-कुश को ज्ञान प्रदान करने वाले महर्षि वाल्मीकि ही थे। माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने ही कलयुग में तुलसीदास के रूप में जन्म लिया और रामचरितमानस की रचना की।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।