10 जनवरी से शुरू होगा माघ स्नान, जानें क्या है माघ माह का धार्मिक महत्व
प्रकृति में रमने और बसने का महीना है माघ। पूरे माघ में किया गया तप बाकी बचे ग्यारह महीनों में गजब की सकारात्मकता प्रदान करता है, देवत्व दिलाता है। तभी तो माघ माह को सर्वाधिक महत्व देते हुए महान संत...

प्रकृति में रमने और बसने का महीना है माघ। पूरे माघ में किया गया तप बाकी बचे ग्यारह महीनों में गजब की सकारात्मकता प्रदान करता है, देवत्व दिलाता है। तभी तो माघ माह को सर्वाधिक महत्व देते हुए महान संत कवि तुलसीदास ने रामचरित मानस के बालखंड में लिखा है- ‘माघ मकर गति रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई।’
तीर्थराज प्रयाग में 10 जनवरी की पौष पूर्णिमा से माघ स्नान शुरू होगा, जो 9 फरवरी की माघी पूर्णिमा तक चलेगा। उत्तर प्रदेश सरकार मेले को महाशिवरात्रि (21 फरवरी) तक चलाने वाली है। पंचतत्वों से बनी इस मानव देह को माघ में तप द्वारा ही पूर्ण किया जा सकता है। संसार में रहते हुए जब पंच तत्वों- ‘क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा। पंच रचित अति अधम शरीरा॥’ पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु इन पांच तत्वों से यह शरीर बना है। असल में तप के द्वारा हम पंच तत्वों में किसी भी तरह से आ गई कमी को पूरा करने में सक्षम हो जाते हैं। जितना तप हम करते हैं, उतना ही हममें देवत्व बढ़ता है।
बहुत से लोग नहाते समय ‘गंगे यमुने चैव गोदावरि सरस्वती। कावेरी नर्मदे सिन्धोर्जलअस्मिन्सन्निधिं कुरु॥’ जरूर कहते होंगे। तीर्थराज प्रयाग में इनमें से तीन गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। हम सबके शरीर में 70 प्रतिशत पानी है, इसलिए माघ माह में किसी भी पवित्र नदी के पास अधिक से अधिक समय बिताना, नहाना, तप करना बहुत जरूरी है।
फिर ब्रह्मा, विष्णु, महादेव आदित्य, मरुद्गण तथा अन्य सभी देवी-देवता इसी माघ मास में संगम स्नान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि प्रयाग में माघ मास में तीन बार स्नान करने से जो फल मिलता है, वह पृथ्वी पर दस हजार अश्वमेध यज्ञ करने से भी प्राप्त नहीं होता।
माघ स्नान से मनुष्य के शरीर में स्थित पाप जल कर भस्म हो जाते हैं। पौष पूर्णमासी से माघ स्नान शुरू होता है। स्नान का सबसे उत्तम समय तभी माना जाता है, जब आकाश में तारागण दिखाई दे रहे हों यानी सूयार्दय से पूर्व।




