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भक्त के लिए भगवान कृष्ण की लीला

एक गांव में गरीब महिला रहती थी और दूध बेचकर अपना जीवनयापन करती थी। वह भगवान मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी, भगवान मदनमोहन भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को मांग लेते। वह दूसरे दिन ही उन्हें वह चीज भेंट कर आती पर वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती।

वह प्रतिदिन उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती। सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती। वही दूध वह नगर में दूसरे लोगों को भी देती। पूरा दूध बेचने के बाद उसके पास बस इतने पैसे ही बचते कि वह दो वक्त का खाना खा सके। इसलिए वह मंदिर जाते समय पास की नदी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती।

दूध बेचकर आने के बाद वह अपनी कुटिया में भगवान के भजनों में लीन हो जाती। कृष्ण कन्हैया तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नए रूप  में प्रकट होते। एक दिन उसके सुंदर जीवन क्रम में रोड़ा आ गया। दूध में जल के साथ-साथ एक छोटी मछली दूध में आ गई और संयोगवश वह मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई।

दूध डालते समय मंदिर के गोसाई की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने दूध वापस कर महिला को खूब डांटा फटकारा और मंदिर में उसका प्रवेश निषेध कर दिया। महिला पर मानों आसमान टूट पड़ा हो। वह रोते बिलखते घर पहुंची और भगवान कृष्ण से बोली कि ठाकुर मुझसे बड़ा अपराध हो गया, क्षमा करो। पानी तो रोज मिलाती हूं , तुमसे कहां छिपा है। अगर न मिलांऊ तो गुजारा कैसे चलेगा।

प्रभु तुमने आज तक कभी आपत्ति नहीं की, मेरा दोष था कि मैंने पानी छानकर नहीं मिलाया लेकिन दुख इस बात का है कि तुम्हारे मंदिर के पुजारी मुझे खूब खरी खोटी सुनाई लेकिन तुम कुछ न बोले। भगवान अगर ये मेरा अपराध है तो प्रतिज्ञा करती हूं कि ऐसा काम आगे न करुंगी और अगर आप मेरा चढ़ावा स्वीकार न करोगे तो मैं यहीं प्राण त्याग दूंगी।

इसी दौरान उसको एक मधुर आवाज सुनाई दी। “माई ओ माई, उसने दरवाजा खोला तो देखा कि वहां थका-हारा भूखा-प्यासा बालक कुटिया में झांक रहा था। महिला ने उसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह बृजवासी है और मदन मोहन के दर्शन को आया था। उसे बड़ी भूख लगी है, कुछ खाने और रात भर सोने की जगह मिल जाए तो वह बहुत आभारी रहेगा।

महिला के शरीर में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई, वह तुरंत ही तैयार हो गई और बालक की खूब आवभगत की। युवक बोला, माता मैं दूध के सिवा कुछ लेता नहीं, थोड़ा दूध मिल जाता तो अच्छा रहता। दूध की बात सुनते ही महिला की आंखें डबडबा आईं, वह बोली कि दूध तो है पर सवेरे का बासी है, जरा ठहरो अभी गाय को सहला कर थोड़ा ताजा दूध दूह लेती हूं।

बालक बोला, अरे मैया नहीं नहीं, उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा प्यासा हूं दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया, तुम मुझे वही सुबह का ही दूध दे दो। डबडबायी आंखों से महिला बोली, बेटा  थोड़ा पानी मिला दूध है जिसमें सुबह मछली आ गई थी पर उसमें मछली आ गई थी। लड़का बोला,अरे मैया तुम मुझे भूखा मारोगी क्या? जल्दी से कच्चा दूध छानकर ऐसे ही दे दो वरना मैं यही दम तोड़ दूंगा।

महिला को आश्चर्य हुआ कि कैसी बात कर बैठा यह युवक, दौड़ी-दौड़ी गई झटपट दूध दे दिया। इधर दूध पीकर बालक का चेहरा खिल उठा। मैया कितना स्वादिष्ट दूध है। तू तो यूं ही न जाने क्या-क्या कह रही थी, अब तो मेरी आंखों में नींद उतर आई है इतना कहकर बालक वहीं सो गया।

महिला अकेली हो गई है तो दिन भर की बातों और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया। सर्दियों के दिन थे,भूखे पेट उसकी आंखों में नींद कहां। सर्दी बढ़ने लगी तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढा दी। रात के अंतिम प्रहर जो आंख लगी कि कृष्ण कन्हैया को सामने खड़ा पाया।
मदन मोहन भगवान ने आज फिर से स्वप्न मे दर्शन दिए और बोले, यह क्या मैया, मुझको मारेगी क्या? गोसाई की बात का

बुरा मानकर रूठ गईं। खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने का कह रही हो। मैंने तो आज तुम्हारे घर आकर दूध पी लिया, अब तू भी अपना व्रत तोड़कर कुछ खा पी लो और हां, मैं दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूं, उसी से मुक्ति मिलती है, अपना नियम कभी मत तोड़ना।

गोसाईं भी अब तेरे को कुछ न कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो, क्या हुआ? इससे दूध और जल्दी हज़म हो जाता है, अब उठो और भोजन करो। महिला हड़बड़ाकर कर उठी तो देखा बालक कुटिया में कहीं नहीं था। सचमुच भेस बदलकर कृष्ण कन्हैया ही कुटिया में पधारे थे। महिला का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया। झटपट दो रोटी बनाईं और भगवान का भोग लगाकर स्वयं खाने लगी। थोड़ी देर में सवेरा हो गया महिला ने देखा कि कृष्ण कन्हैया उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।

इधर, मंदिर के पट खुलते ही पुजारी ने मदन मोहनजी को देखा तो पाया की प्रभु फटी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं। पुजारी समझ गये कि प्रभु ने अवश्य फिर कोई लीला की है। इसी बीच महिला मंदिर के द्वार पर पहूंची और पुजारी से बोली, गुसाई महाराज देखो प्रभु की लीला। पीतांबर मेरे घर छोड़ आये हैं और मेरी फटी ओढ़नी ले आये।

कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था, लेकिन भूखा प्यासा मेरा कन्हैया दूध के लिये घर आ गया। पुजारी देवी के सामने बैठ गए। भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला, भक्ति बंधन को ठेस पहुंचाकर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला देवी मुझे क्षमा कर दो।

उधर, मूर्ति में विराजमान कन्हैया धीरे-धीरे मुस्कुरा कर कह रहे थे, अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहां!!

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  • Web Title:Lord for the devotee