Keshav Vatika of sri Krishna Janmasthan opened for public after 24 years - मथुरा में 24 वर्ष बाद खुली कृष्ण जन्मस्थान की केशव वाटिका DA Image

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मथुरा में 24 वर्ष बाद खुली कृष्ण जन्मस्थान की केशव वाटिका

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केंद्र सरकार में कांग्रेसकी सरकार और प्रदेश में मायावती की सरकार के दौरान प्रशासन द्वारा बैरीकेडिंग कर लोगों के लिए प्रतिबंधित की गई श्री कृष्ण जन्मस्थान की केशव वाटिका आम लोगों के लिए खोल दी गई है। इसे खोलने की घोषणा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 23 फरवरी 2018 में की थी लेकिन इसे खोलने में अड़चन आ रही थीं। इसके खुलने पर श्रीकृष्ण जन्मस्थान संस्थान में प्रसन्नता है। केशव वाटिका जन्माष्टमी के मौके पर प्रकाश से नहाई हुई नजर आई।

3.5 एकड़ में बने इस पार्क को प्रशासन के कब्जे से मुक्ति दिलाने के लिए योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ सहित विहिप के दिग्गज नेताओं ने 84 कोस की यात्रा की थी। प्रशासन यह मानता था कि यह जगह श्री कृष्ण जन्मथान की है। इसके बावजूद जगह पर कोई  श्रद्धालु नहीं जा सकता था। श्रीकृष्ण जन्मस्थान के उत्तर में 3.5 एकड़ में में केशव वाटिका बनी हुई है। और इसकी देखभाल कृष्ण जन्मस्थान के लोग ही करते हैं। 1995 से पूर्व यहां बेरोक टोक आवागमन था। कृष्ण जन्मस्थान के विभिन्न कार्यक्रम भी यहां होते थे। 90 के दशक में विहिप का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन भी यहीं हुआ था। केशव वाटिका को लेकर हिन्दुस्तान ने खबर भी लगाई थी।

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1995 में की थी बैरीकेडिंग : 
1995 में विहिप द्वारा आयोजित विष्णु महायज्ञ विड़ला मंदिर के समीप हुआ था। उससे पहले सुरक्षा का जायजा लेने उस समय के केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट भी यहां आए थे। उनके दौर के बाद यहां पर प्रशासन ने बैरीकेड लगाकर बंद कर दिया था। तब यह आशंका जताई गई थी कि विष्णु महायज्ञ के दौरान एकत्र भीड़ से कोई अप्रिय घटना घट सकती है। यहां स्वरूप न बिगड़े इसलिए कृष्ण जन्मस्थान संस्थान इसकी देखभाल कर रहा था। जन्मस्थान के लोग पार्क की देखभाल करने तो जा सकते थे, सुंदर पार्क में पानी भी दिया जाता था लेकिन श्रृद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगी हुई थी।


विहिप नेताओं ने की थी 84 कोस परिक्रमा-
इस यात्रा को प्रसाशन मुक्त कराने के लिए 1999 में योगी आदित्यनाथ के गुरु स्वर्गीय महंत अवैद्यनाथ, नृत्यगोपालदास महाराज, दगद्गुरु शंकराचार्य बासुदेवानंद सरस्वती, आचार्य गिर्राज किशोर और अशोक सिंघल ने विश्राम घाट पर संकल्प लेकर 84 कोस की यात्रा शुरू की थी। यात्रा पूर्ण होने इस स्थान को मुक्त कराने के लिए प्रवेश करना था। यात्रा पूर्ण होने से पूर्व ही वामदेव महाराज का स्वर्गवास हो गया था जिसके कारण आगे का कार्यक्रम स्थगित हो गया था।

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