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Karwa Chauth 2020 Vrat Katha: माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए सबसे पहले रखा था करवा चौथ व्रत, पढ़ें ये पौराणिक कथा

लाइव हिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीPublished By: Saumya Tiwari
Wed, 04 Nov 2020 08:44 AM
Karwa Chauth 2020 Vrat Katha: माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए सबसे पहले रखा था करवा चौथ व्रत, पढ़ें ये पौराणिक कथा

करवा चौथ व्रत (Karwa Chauth Vrat 2020) आज यानी 4 नवंबर को है। करवा चौथ व्रत हर सुहागिन स्त्री के लिए बेहद खास होता है। इस दिन वह निर्जला व्रत रखकर पति की लंबी आयु की कामना करती है। कहा जाता है कि इस व्रत को देवताओं के लिए उनकी पत्नियों ने भी रखा था। इस व्रत का प्रसंग महाभारत काल में भी मिलता है। करवा चौथ व्रत को लेकर यूं तो कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी है। जानिए आखिर कैसे करवा चौथ व्रत (Karva Chauth Vrat Katha) की शुरुआत हुई और किसने सबसे पहले रखा था यह व्रत-

माता पार्वती ने सबसे पहले रखा प्रभु भोलेनाथ के लिए व्रत-

एक पौराणिक कथा के अनुसार, सबसे पहले करवा चौथ का व्रत शक्ति स्वरूपा मां पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था। इसी व्रत से उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई थी। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर सुहागिन स्त्रियां पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।

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ब्रह्मदेव ने दी थी सलाह-

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवताओं और राक्षसों के बीच जोरदार युद्ध छिड़ा था। तमाम कोशिशों के बाद भी देवताओं को सफलता हासिल नहीं हो रही थी। देवताओं पर दैत्य हावी हो रहे थे। तभी ब्रह्मदेव ने देवताओं की पत्नियों को करवा चौथ व्रत रखने के लिए कहा था। उन्होंने बताया कि इस व्रत को रखने से दैत्य देवताओं से परास्त होंगे। इसके बाद देवताओं की पत्नियों ने युद्ध में सफलता और लंबी आयु की कामना के लिए करवा चौथ व्रत किया था। कहते हैं कि तभी से कार्तिक मास की चतुर्थी दिन से इस व्रत को रखने की परंपरा शुरू हुई।

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करवा चौथ को लेकर ये कथा भी है प्रचलित-

करवा चौथ व्रत से जुड़ी एक कथा महाभारत काल की मिलती है। कथा के अनुसार, एक बार अर्जुन नीलगिरी पर्वत पर तपस्या करने गए थे। उसी दौरान पांडवों पर कई तरह के संकट आ गए। तब द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से पांडवों के संकट से बचने का उपाय पूछा। इस पर भगवान कृष्ण ने उन्हें कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत रखने के लिए कहा था। कहते हैं कि द्रौपदी ने यह व्रत किया और उन्हें संकट से मुक्ति मिल गई।

(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

 

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