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कठिन है कांवड़ यात्रा, नियम भी हैं सख्त

भगवान शिव की कृपा पाने के लिए कांवड़ यात्रा श्रेष्ठ माध्यम है। कांवड़ यात्रा आरंभ होते ही केसरिया वस्त्रों में कांवड़ियों के जत्थे दूर-दूर से गंगाजल भरकर शिवालयों की ओर प्रस्‍थान करना शुरू कर देते हैं। कांवड़ यात्रा मुश्किल है और इस यात्रा के दौरान कावड़ियों को कुछ नियमों का पालन भी करना पड़ता है जो अत्यंत आवश्यक होता है। यह यात्रा पैदल तय की जाती है। यह यात्रा जितनी मुश्किल है इसके नियम भी उतने ही सख्त हैं।

यह यात्रा समूह में की जाती है अथवा एक साथी अवश्य होना चाहिए। यात्रा सूर्योदय से दो घंटे पूर्व और सूर्यास्त के दो घंटे बाद तक करना चाहिए। रात्रि में यात्रा को स्थगित रखना चाहिए। कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़ियों का व्यवहार सहज होना चाहिए। यात्रा के दौरान कांवड़िये भगवान शिव के नाम का जाप करते चलते हैं। भगवान शिव बैरागी हैं और बैराग्य ही उनको प्रिय है। कांवड़ यात्रा के दौरान किसी भी तरह की शृंगार सामग्री का प्रयोग कांवड़िये नहीं करते हैं। कांवड़ को अपने सिर पर उठाकर ले जाना भी वर्जित है। यात्रा पूरी होने तक मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज करना होता है। बिना स्नान किए कांवड़ को हाथ नहीं लगा सकते हैं। कांवड़ियों के लिए चमड़े की किसी वस्तु का स्पर्श और चारपाई का प्रयोग वर्जित है। किसी वृक्ष या पौधे के नीचे भी कांवड़ को रखना वर्जित है। यदि शौच, विश्राम आदि के लिए रुकना पड़े तो कांवड़ को नीचे रखने के बजाय पेड़ पर या ऊंचे स्थान पर लटकाया जाता है।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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  • Web Title:Kanvad Yatra
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