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ज्येष्ठ अमावस्या: शनि की कृपा पाने के लिए इस दिन करें विशेष पूजा

हिन्दू कैलेण्डर में नए चन्द्रमा के दिन को अमावस्या कहते हैं। पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए अमावस्या के सभी दिन श्राद्ध की रस्मों को करने के लिए उपयुक्त हैं। कालसर्प दोष निवारण की पूजा करने के...

ज्येष्ठ अमावस्या: शनि की कृपा पाने के लिए इस दिन करें विशेष पूजा
लाइव हिन्दुस्तान टीम, मेरठ Mon, 18 May 2020 05:59 PM
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हिन्दू कैलेण्डर में नए चन्द्रमा के दिन को अमावस्या कहते हैं। पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए अमावस्या के सभी दिन श्राद्ध की रस्मों को करने के लिए उपयुक्त हैं। कालसर्प दोष निवारण की पूजा करने के लिए भी अमावस्या का दिन उपयुक्त होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ अमावस्या पर शनि देव का जन्म हुआ था।

इसलिए ज्येष्ठ अमावस्या का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। ज्येष्ठ अमावस्या जब सोमवार के दिन पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं और अमावस्या जब शनिवार के दिन पड़ती है तो उसे शनि अमावस्या कहते हैं।

कब है ज्येष्ठ अमावस्या
पंडित राजीव शर्मा ने बताया कि ज्येष्ठ मास में अमावस्या को धर्म कर्म, स्नान-दान आदि के लिहाज से यह बहुत ही शुभ व सौभाग्यशाली माना जाता है। 2020 में ज्येष्ठ मास की अमावस्या 22 मई को शुक्रवार के दिन है। इस दिन को शनि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

ज्येष्ठ अमावस्या और शनि जयंती
ज्येष्ठ अमावस्या को शनि देव की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। सूर्य पुत्र शनि देव हिन्दू ज्योतिष में नवग्रहों में से एक हैं। शनि दोष से बचने के लिए इस दिन शनिदोष निवारण के उपाय विद्वान ज्योतिषाचार्यों के करवाने से सभी कष्ट कट जाते हैं। इस कारण ज्येष्ठ अमावस्या का महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है।

वैदिक ज्योतिष में शनि देव सेवा और कर्म के कारक हैं, अतः इस दिन उनकी कृपा पाने के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। शनि देव न्याय के देवता हैं उन्हें दण्डाधिकारी और कलियुग का न्यायाधीश कहा गया है। शनिदेव संसार के सभी जीवों को उनके कर्मों का फल प्रदान करते हैं।

व्रत व पूजा विधि
उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या विशेष रूप से सौभाग्यशाली एवं पुण्य फलदायी मानी जाती है। शनि जयंती के साथ-साथ इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत भी रखती हैं। इस दिन स्त्री-पुरुष दोनों ही उपवास रख सकते हैं। इसके लिए  प्रात: काल उठकर नित्य क्रियाओं से निवृत होकर धार्मिक तीर्थ स्थलों, पवित्र नदियों, सरोवर में स्नान करना चाहिए। ऐसा न हो तो घर पर ही स्वच्छ जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं।

स्नान के पश्चात सूर्यदेव को अर्घ्य देकर बहते जल में तिल प्रवाहित करने चाहिये। इसके पश्चात पीपल वृक्ष में जल का अर्घ्य दिया जाता है। साथ ही शनि देव की पूजा भी की जाती है। जिसमें शनि चालीसा सहित शनि मंत्र का जाप भी आप कर सकते हैं। वट सावित्री व्रत रखने वाली स्त्रियां इस दिन यम देवता की पूजा करती हैं। पूजा के पश्चात सामर्थ्यनुसार दान-दक्षिणा अवश्य देनी चाहिये। इस दिन वट वृक्ष की भी पूजा की जाती है।

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