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जया पार्वती व्रत 2018 : अखंड सौभाग्य की कामना करने के लिए किया जाता है यह व्रत, 24 से 31 जुलाई के बीच मनाया जाएगा

jaya parvati vrat

जया पार्वती व्रत हर साल आषाढ़ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को किया जाता है। इसे विजया-पार्वती व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह मूल रूप से मालवा क्षेत्र में किया जाता है। यह व्रत मां पार्वती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। यह गणगौर, हरतालिका, मंगला गौरी और सौभाग्य सुंदरी व्रत की तरह है। इस साल यह व्रत 24 से 31 जुलाई के बीच मनाया जाएगा।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान प्राप्त  होता है। इस व्रत का रहस्य भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को बताया था। इस व्रत को कुछ क्षेत्रों में सिर्फ 1 दिन के लिए, तो कुछ जगहों पर 5 दिन तक मनाया जाता है। बालू रेत का हाथी बना कर उन पर 5 प्रकार के फल, फूल और प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। 

जानें क्या है इस व्रत की पूजन विधि

  • आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें। 
  • तत्पश्चात व्रत का संकल्प करके माता पार्वती का ध्यान करें। 
  • पूजा के स्थान पर शिव-पार्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। 
  • फिर भगवान शिव-पार्वती को कुंमकुंम, शतपत्र, कस्तूरी, अष्टगंध और फूल चढ़ाकर पूजा करें। 
  • ऋतु फल तथा नारियल, अनार व अन्य सामग्री अर्पित करें। 
  • अब विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन करें।
  • माता पार्वती का स्मरण करके स्तुति करें।  
  • फिर मां पार्वती का ध्यान धरकर सुख-सौभाग्य और गृहशांति के लिए सच्चे मन से प्रार्थना करें। 
  • कथा सुनें और आरती करके पूजन को संपन्न करें। 
  • कथा और आरती के बाद ब्राह्मण को भोजन करवाएं और इच्छानुसार दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें। 
  • अगर बालू रेत का हाथी बनाया है तो रात्रि जागरण के पश्चात उसे नदी या जलाशय में विसर्जित करें। 

व्रत का खाना
इस व्रत में नमक खाना पूरी तरह से वर्जित माना जाता है। इसके अलावा गेहूं का आटा, सभी तरह की सब्जियां भी नहीं खानी चाहिए। व्रत के दौरान फल, दूध, दही, जूस, दूध से बनी मिठाइयां खा सकते हैं। व्रत के आखिरी दिन मंदिर में पूजा के बाद नमक, गेहूं के आटे से बनी रोटी या पूरी और सब्जी खाकर व्रत का उद्यापन किया जाता है।

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जया-पार्वती व्रत कथा  
पौराणिक कथा के अनुसार किसी समय कौडिन्य नगर में वामन नाम का एक योग्य ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सत्या था। उनके घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान नहीं होने से वे बहुत दुखी रहते थे।

एक दिन नारद जी उनके घर आए। उन्होंने नारद की खूब सेवा की और अपनी समस्या का समाधान पूछा। तब नारद ने उन्हें बताया कि तुम्हारे नगर के बाहर जो वन है, उसके दक्षिणी भाग में बिल्व वृक्ष के नीचे भगवान शिव माता पार्वती के साथ लिंगरूप में विराजित हैं। उनकी पूजा करने से तुम्हारी मनोकामना अवश्य ही पूरी होगी।

ब्राह्मण दंपत्ति ने उस शिवलिंग को ढूंढ़कर उसकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इस प्रकार पूजा करने का क्रम चलता रहा और पांच वर्ष बीत गए। एक दिन जब वह ब्राह्मण पूजन के लिए फूल तोड़ रहा था तभी उसे सांप ने काट लिया और वह वहीं जंगल में ही गिर गया। ब्राह्मण जब काफी देर तक घर नहीं लौटा तो उसकी पत्नी उसे ढूंढने आई। पति को इस हालत में देख वह रोने लगी और वन देवता व माता पार्वती को स्मरण किया।

ब्राह्मणी की पुकार सुनकर वन देवता और मां पार्वती चली आईं और ब्राह्मण के मुख में अमृत डाल दिया, जिससे ब्राह्मण उठ बैठा। ब्राह्मण दंपत्ति ने माता पार्वती का पूजन किया। माता पार्वती ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें वर मांगने के लिए कहा। तब दोनों ने संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। माता पार्वती ने उन्हें विजया पार्वती व्रत करने की बात कही। 

आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन उस ब्राह्मण दंपत्ति ने विधिपूर्वक माता पार्वती का यह व्रत किया, जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। इस दिन व्रत करने वालों को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है तथा उनका अखंड सौभाग्य भी बना रहता है।

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  • Web Title:Jaya Parvati Vrat 2018 date and katha