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Jaya Ekadashi: जया एकादशी पर दुर्लभ संयोग, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि, उपाय, व्रत कथा और पारण टाइम

Jaya Ekadashi Katha: इस साल 20 फरवरी को जया एकादशी का व्रत रख विष्णु भगवान की विधिवत पूजा होगी। श्रीहरि को प्रसन्न करने के लिए जया एकादशी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

Jaya Ekadashi: जया एकादशी पर दुर्लभ संयोग, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि, उपाय, व्रत कथा और पारण टाइम
Shrishti Chaubeyलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीTue, 20 Feb 2024 07:32 AM
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Jaya Ekadashi: इस साल 20 फरवरी के दिन जया एकादशी पड़ रही है। यह एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है, जो प्रभु श्री हरी विष्णु को समर्पित है। उदया तिथि के अनुसार, 20 फरवरी के दिन जया एकादशी का व्रत रखा जाएगा और पूरे विधि-विधान से विष्णु भगवान की पूजा-अर्चना की जाएगी। श्रीहरि को प्रसन्न करने के लिए यह दिन महत्वपूर्ण है। मान्यताओं के अनुसार, जया एकादशी का व्रत रखने से जातक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। इसलिए आइए जानते हैं जया एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत पारण का समय-

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जया एकादशी पर अद्भुत संयोग
ज्योतिष गणना के अनुसार, इस बार जया एकादशी पर अद्भुत संयोग बन रहा है। आयुष्मान योग, त्रिपुष्कर योग, प्रीति योग और रवि योग के शुभ संयोग में जया एकादशी का व्रत रखा जाएगा। जया एकादशी पर त्रिपुष्कर योग की शुरुआत दोपहर 12:13 से होगी, जो अगले दिन सुबह 06:38 बजे तक रहेगा। रवि योग 06:39 ए एम से 12:13 पी एम, प्रीति योग सुबह 11:46 बजे तक रहेगा, जिसके बाद आयुष्मान् योग का निर्माण होगा। इस दिन आर्द्रा नक्षत्र दोपहर 12:13 बजे तक रहेगा, जिसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र का निर्माण होगा। 

जया एकादशी शुभ मुहूर्त-
एकादशी तिथि प्रारम्भ - फरवरी 19, 2024 को 08:49 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त - फरवरी 20, 2024 को 09:55 ए एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय - 06:38 ए एम से 08:55 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय - 11:27 ए एम

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पूजा-विधि 
स्नान आदि कर मंदिर की साफ सफाई करें
भगवान श्री हरि विष्णु का जलाभिषेक करें
प्रभु का पंचामृत सहित गंगाजल से अभिषेक करें
अब प्रभु को पीला चंदन और पीले पुष्प अर्पित करें
मंदिर में घी का दीपक प्रज्वलित करें
संभव हो तो व्रत रखें और व्रत लेने का संकल्प करें
जया एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें
पूरी श्रद्धा के साथ भगवान श्री हरि विष्णु और लक्ष्मी जी की आरती करें
प्रभु को तुलसी दल सहित भोग लगाएं
अंत में क्षमा प्रार्थना करें

जया एकादशी व्रत कथा-कहानी 
एक बार अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न करते है — “हे भगवान ! अब कृपा कर आप मुझे माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्त्व है विस्तारपूर्वक बताएं। माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी में किस देवता की पूजा करनी चाहिए तथा इस एकादशी व्रत की कथा क्या है ? उसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है शीघ्र ही बताएं?” भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – “हे अर्जुन ! माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। इस दिन उपवास रखने से मनुष्य भूत, प्रेत, पिशाच आदि की योनि से छुटकारा मिल जाता है। इस दिन विधिपूर्वक उपवास व्रत करना चाहिए। मैं अब तुमसे जया एकादशी व्रत की कथा कहता हूं।"

एक समय की बात है नंदन वन में उत्सव का आयोजन हो रहा था। देवता, ऋषि मुनि  सभी उस उत्सव में मौजूद थे। उस समय गंधर्व गा रहे थे तथा  गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थी। इन्हीं गंधर्वों में एक माल्यवान नाम का गंधर्व भी था जो बहुत ही सुरीला गाता था। जितनी सुरीली उसकी आवाज़ थी उतना ही रूपवान भी था। गंधर्व कन्याओं में एक पुष्यवती नामक नृत्यांगना भी थी। पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या ने माल्यवान नामक गंधर्व को देखते ही उस पर आसक्त हो गई तथा अपने हाव-भाव से उसे रिझाने का प्रयास करने लगी। माल्यवान भी उस पुष्पवती पर आसक्त होकर अपने गायन का सुर-ताल भूल गया। इससे संगीत की लय टूट गई और संगीत का सारा आनंद बिगड़ गया।

सभा में उपस्थित देवगणों को यह अच्छा नहीं लगा। माल्यवान के इस कृत्य से इंद्र भगवान नाराज होकर उन्हें श्राप देते हैं कि स्वर्ग से वंचित होकर मृत्यु लोक में पिशाचों सा जीवन भोगो क्योंकि तुमने संगीत जैसी पवित्र साधना का तो अपमान किया ही है साथ ही सभा में उपस्थित गुरुजनों का भी अपमान किया है। इंद्रा भगवान के शाप के प्रभाव से दोनों पृथिवी पर हिमालय पर्वत के जंगल में  पिशाची जीवन व्यतीत करने लगे।

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पिशाची जीवन बहुत ही कष्टदायक था। दोनों बहुत दुखी थे। एक बार माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन संयोगवश दोनों ने कुछ भी भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म किया। उस दिन मात्र फल-फूल खाकर ही पूरा दिन व्यतीत किया। भूख से व्याकुल तथा ठंड के कारण बड़े ही  दुःख के साथ पीपल वृक्ष के नीचे  इन दोनों ने एक-दूसरे से सटकर बड़ी कठिनता पूर्वक पूरी रात काटी। पूरी रात अपने द्वारा किये गए कृत्य पर पश्चाताप भी करते रहे और भविष्य में इस प्रकार के भूल न करने की भी ठान लिया था सुबह होते ही दोनों की मृत्यु हो गई।

अंजाने में ही सही उन्होंने एकादशी का उपवास किया था। भगवान के नाम का जागरण भी हो चुका था परिणामस्वरूप प्रभु की कृपा से इनकी पिशाच योनि से मुक्ति हो गई और पुनः अपनी अत्यंत सुंदर अप्सरा और गंधर्व की देह धारण करके तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर दोनों स्वर्ग लोक को चले गए। देवराज इंद्र उन्हें स्वर्ग में देखकर आश्चर्यचकित हुए और पूछा कि वे श्राप से कैसे मुक्त हुए। तब उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु की उन पर कृपा हुई। हमसे अंजाने में माघ शुक्ल एकादशी यानि जया एकादशी का उपवास हो गया जिसके प्रताप से भगवान विष्णु ने हमें पिशाची जीवन से मुक्त किया। कुछ इस तरह से जया एकादशी का व्रत करने से भक्त को पूर्व में किये गए पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है।

उपाय- जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए विष्णु चालीसा का पाठ करें। प्रभु को गुड़ और चने की दाल का भोग लगाएं। 

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