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Janmashtami 2019 : द्वैत के बीच संतुलन सिखाते हैं श्रीकृष्ण

जीवन के बारे में कहा जाता है कि यह एक संघर्ष है। नित्य अपने को स्थापित और सत्यापित करने की मुहिम में कार्यक्षेत्र कब कुरुक्षेत्र में बदल जाता है, हमें ज्ञात ही नहीं होता। तनाव झेल रहे हर व्यक्ति के लिए जन्माष्टमी कृष्ण के चरित्र को आत्मसात करने का संदेश है, क्योंकि हर बालक में उनकी छवि है, हर मनुष्य में उनका निवास है। आप और हम, सब की तरह जिंदगी को साधारण से असाधारण बनाने के लिए आजीवन संघर्षरत भी रहे कृष्ण। जन्म हुआ तो कारागार में, जन्म लेते ही अपने जैविक माता-पिता से दूर हो गए, तो युवावस्था महाभारत के युद्ध की दिशा तय करने में बीती। लेकिन इन सबके बाद भी कृष्ण के जीवन में रास का रस भी है, क्योंकि गीता में गोविंद जिस समभाव की सीख देते हैं, अपनी जिंदगी में उसे ही उतार लेते हैं।

संतुलन बनाए रखने के लिए श्रीकृष्ण द्वैत भावों के बीच संतुलन बनाए हर जगह नजर आते हैं। अर्जुन को रणभूमि की ओर प्रेरित करने वाले श्रीकृष्ण स्वयं रणछोड़ हैं। मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा कहीं न कहीं अहंकार का पर्याय हैं और कृष्ण इनसे सर्वथा दूर हैं। वे अहंकार के प्रति असहिष्णु हैं, यही कारण है कि इंद्र पूजा की प्रथा बंद कराकर उन्होंने गोवर्धन पूजा की परम्परा शुरू करवाई। दुष्ट, दुराचारी और अनाचारी राजाओं का अंत अहंकार के प्रति श्रीकृष्ण की असहिष्णुता का परिणाम था।

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कुरुक्षेत्र में विधर्मियों और उनके सहयोगियों के साथ वह उसी भाषा का प्रयोग करते हैं, नहीं तो धर्मयुद्ध में शिखंडी की आड़ लेकर बाण चलाना कैसे न्यायसंगत हो सकता है? गुरु द्रोण को युद्ध से विरक्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने धर्मराज से ‘अश्वत्थामा हत: नर: वा कुंजर:' कहलवाया और अंत के दो शब्दों के उच्चारण के समय भीम से नगाड़ा बजवा दिया। पुत्र वध की घोषणा सुनते ही शस्त्र त्याग दिए गुरु द्रोण ने और उसी समय धृष्टद्युम्न ने उनकी हत्या कर दी।

श्रीकृष्ण धार्मिक हैं, पर धर्मांध नहीं हैं। वह उन परम्पराओं के विरुद्ध खड़े हैं, जो ्त्रिरयों का अपमान करती हैं। रास का जिनके मन में प्रवाह है, वे द्वारिका में अपने कुटुम्बीजनों को सर्वनाश से बचाने के लिए भी उद्धत नहीं हुए, क्योंकि उन्हें मालूम है कि जब एकता भंग होगी, तो विनाश कुछ ही कदमों पर खड़ा मिलेगा।

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सुदामा के संदर्भ में परिग्रह और अभाव का अंतर समझते हैं श्रीकृष्ण। उन्हें ज्ञात है कि परिवार के पोषण के लिए धन चाहिए। बुद्धि का वैभव उचित है, पर परिवार का पालन भी प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है। भोग व योग के बीच समन्वय को स्थापित करना कृष्ण ने दुनिया को सिखाया है। एक ओर वह नवीन साम्राज्य निर्माता तथा स्वराज्य स्रष्टा युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए, तो दूसरी ओर अध्यात्म में भी उनकी प्रवृत्ति चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई। गीता का ज्ञान उसका जीवंत उदाहरण है।

वास्तव में, श्रीकृष्ण एक ऐसा आदर्श चरित्र हैं, जो जिंदगी के मायने तलाश कर रहे हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है, जो अपने जीवन को गहराई व तीव्रता के साथ जीना चाहता है। जीवन को पूर्ण बनाने के लिए विविध प्रकार के अनुभवों को बिना विचलित हुए अपनाना पड़ता है, और शांत भाव से कर्मशील रहना पड़ता है, क्योंकि फल हमेशा कल में होगा, परंतु कर्म करने का दिन आज है।
 

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  • Web Title:Janmashtami 2019 : know all about meaning of shri krishna
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