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Janmashtami 2019: अपने जीवन में बसाएं श्रीकृष्ण

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श्रीकृष्ण का अवतार इस धरती पर एक अभूतपूर्व घटना थी। उन्होंने स्वयं जीवन के हर रंग को उसकी समग्रता के साथ स्वीकार कर मनुष्य को समभाव से जीने का संदेश दिया। उन्होंने लोगों को दुष्टों से मुक्ति दिलाई और पार्थसारथि के रूप में मानवता की मुक्ति का मार्ग प्रशस्तकिया। श्रीकृष्ण को बसाएं अपने जीवन में

जो सबका उद्धार करने, सम्पूर्ण संसार का कल्याण करने के लिए आता है, उसे नित्य अवतार कहते हैं। अगर श्रीकृष्ण के जीवन को देखो, तो जान लोगे कि चराचर सृष्टि पर उसी अगम, अगोचर, अगाध की सत्ता है। इंद्रियों से उसे तुम जान नहीं सकते, मन से उसका मनन नहीं हो सकता, बुद्धि से उसका चिंतन नहीं हो सकता। ऐसी परमात्म सत्ता को कायम रखने के लिए कृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों का जन्म होता है।.

कृष्ण पूर्ण पुरुष हैं। जन्माष्टमी का दिन इसलिए मनाते हैं, ताकि तुम इस महापुरुष लीलाधारी को याद कर सको। एक बात श्रीकृष्ण के जीवन से हमें सीखने को मिलती है कि कोई कितना ही ज्ञानी क्यों न हो जाए, कितना ही ब्रह्मनिष्ठ क्यों न हो जाए, उसका आचरण ऐसा होना चाहिए, जैसे एक साधारण मनुष्य का होता है। अगर किसी को जरा-सा ज्ञान सुनने को मिल जाए, वह दूसरों को भाषण देने लगता है। दूसरों को सलाह-मशवरा देने लगता है। लेकिन श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुष हैं, पूर्णज्ञानी हैं, फिर भी अपने मुख से ज्ञान की बात तब तक नहीं खोलते हैं, जब तक अर्जुन हाथ जोड़ कर प्रार्थना नहीं करता कि ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।' मैं आपका शिष्य हुआ। आप मेरे गुरु बन कर मेरे उद्धार का मार्ग बताइए।

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श्रीकृष्ण ही ज्ञान के द्वारा वह चमत्कार करवा सकते हैं कि मोह ग्रस्त हुए अर्जुन को मात्र सवा घंटे के वार्तालाप में उस स्थिति में लाकर खड़ा किया, जहां अर्जुन कह पाया कि ‘कैसा मोह, कैसा शोक, मृत्यु का कैसा भय, जन्म की क्या चिंता करनी! मेरा सारा मोह नष्ट हो गया है। मुझे अपने आत्मस्वरूप का स्मरण हो गया है। श्रीकृष्ण के गुरु बनते ही उनके वचनों को सुन कर अर्जुन के चित्त का अंधकार दूर हो गया। आज भी अगर तुम प्रेम से पुकारो, तो तुम्हारे शरीर में उनके प्रेम की तरंगें स्पंदित होने लग जाएंगी, क्योंकि कृष्ण किसी एक व्यक्ति का नाम है भी और नहीं भी है। श्री कृष्ण खुद अपने मुख से कहते रहे कि ‘मैं अव्यक्त हूं, अजन्मा हूं।' कृष्ण से जुड़ने के हजार तरीके हैं। सुदामा के लिए कृष्ण बचपन के सखा ही रहे, कभी बड़े ही नहीं हुए। मीरा के लिए कृष्ण पूर्ण पुरुष हैं। उन्हें वह अपने प्रेमी के, अपने पति के रूप में देखती थीं। चैतन्य महाप्रभु के लिए कृष्ण अवतारी पुरुष हैं। कृष्ण को वह भाव से अपने भीतर महसूस करते हैं।.

यूं तो जन्माष्टमी अजन्मा का जन्मोत्सव है। यह बात सत्य है कि रात्रि के 12 बजे कृष्ण का जन्म होता है। जब दो सुइयां आपस में मिल जाती हैं, ऐसे ही मनुष्य के अंदर कृष्ण-चेतना का जन्म तब होता है, जब भक्त का भक्ति तत्व मिट कर उसी भगवत्ता में प्रकट हो जाता है। कृष्ण-चेतना आज इसी वक्त जन्म ले सकती है। जैसे घड़ी की सुइयां मिल जाती हैं, वैसे ही तुम्हारा ‘मैं' उस विश्वव्यापक चैतन्य कृष्ण के ‘मैं' के साथ जब मिल जाता है, तो तुम्हारे ही भीतर कृष्ण-चेतना का जन्म हो जाता है। बाहर की जन्माष्टमी मनाना इसलिए जरूरी है, ताकि तुमको याद आ जाए कि मेरे भीतर अभी भी उतना ही अंधकार है, जितना कृष्ण के जन्म के समय उनके माता-पिता के कारागार में था।

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मन के अंधकार, मोह, ममता, भय, क्रोध इन सबसे अगर मुक्ति चाहते हो, तो फिर भीतर की जन्माष्टमी मनाओ। भीतर की जन्माष्टमी वही मना पाएगा, जिसके भीतर कृष्ण-चेतना का जन्म हुआ हो। गुरु की कृपा से सत्संग और साधना करते हुए कृष्ण-चेतना भीतर अकस्मात् प्रस्फुटित हो जाती है। ज्ञान के पथ पर चलने वाला साधक कहता है कि ‘मुझे मोक्ष मिले' और योग के पथ पर चलने वाला चाहता है कि ‘मुझे निर्वाण प्राप्त हो', पर प्रेम के पथ पर चलने वाला प्रेमी तो कहता है कि ‘मैं मोक्ष का क्या करूंगा? मैं निर्वाण का क्या करूंगा? मुझे तो बस एक चीज चाहिए। कृष्ण का प्रेम। 

इस बात को इतनी स्पष्टता से और सुंदर ढंग से आदि गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है- ‘राज न चाहो मुकत न चाहो, मन प्रीत चरण कमलारे॥' मुझे राज नहीं चाहिए। राज का अर्थ हुआ धन का सुख, साम्राज्य, सत्ता। सत्ता से जुड़ा है धन, धन से जुड़ा है वैभव, वैभव से जुड़ा है साम्राज्य। भक्त को राज नहीं चाहिए। राज एक ज्ञान या योग के साधक को भी नहीं चाहिए। वह कहता है, ‘राज न चाहूं, मुक्ति न चाहूं।' देखिए, आप ये ही दो चीजें ईश्वर से मांगते हो। फिर दूसरे किस्म के लोग कहते हैं कि ‘हे भगवान! पार लगा दो, समाधि दे दो, भवबंधन से मुक्ति दे दो।' मांग दोनों ही रहे हैं। एक मांग रहा है संसार को और दूसरा मांग रहा है संसार से छुट्टी कर देने को। लेकिन असली भक्त वही है, जो कहता है कि न संसार चाहिए, न मुक्ति चाहिए। हम तो तेरे दीवाने हैं, बस अपनी दीवानगी दे दे। कृष्ण को बस जाने दो अपने जीवन में, बस जाने दो अपनी नस-नस में। कृष्ण को बस जाने दो यानी ज्ञान को, स्वतंत्रता को, मधुरता को, ध्यान को अपने जीवन में बस जाने दो। जीवन को तोड़ कर नहीं, आनन्द से देखो।.

जीवन है समग्रता, जीवन है सम्पूर्णता। पूर्णता तभी होगी, जब सब कुछ उसी में मिला हो। जीवन को पूर्ण ढंग से, पूर्ण तरंग से जीएं। त्वरा के साथ जीएं। इसी समग्रता, सम्पूर्णता का चिह्न हैं श्रीकृष्ण।

 मन के अंधकार, लोभ, मोह, ममता, भय, क्रोध इन सबसे अगर मुक्ति चाहते हो, तो फिर भीतर की श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाओ। भीतर की जन्माष्टमी वही मना पाएगा, जिसके भीतर कृष्ण-चेतना का जन्म हुआ हो।
 

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