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Janmashtami 2019: सब विकार हर लेते हैं श्रीकृष्ण

जन्‍माष्‍टमी

सूफी भक्त बुल्ले शाह भी ठगे से रह गए। अपनी बुक्कल में कस कर सीने से लगा रखा था, कब फिसल कर भाग गया, पता ही नहीं चला। किसी से कह न पाए, फिर भी दुनिया भर में शोर मच गया- मेरी बुक्क्ल दे विच चोर नी, किसनू कूक सुणावां, चोरी-चोरी निकल गया ते जग विच पै गया शोर। 

‘बुक्क’ शब्द संस्कृत का है। अर्थ है- हृदय, छाती। तो हृदय प्रदेश को किसी वस्त्र से लपेटने को ‘बुक्कल मारना’ कहते हैं। इसकी ओट में कुछ भी छुपा कर रखा जा सकता है। बुल्ले शाह ने भी अपने ईस्ट को हृदय में संजोकर रखा था, पर वह चोरी-चोरी निकल गया। संसार में वह तरह-तरह के रूप धारण कर सकता है।  जिसने समझने का यत्न किया, उसकी पकड़ में आ गया। वह आवरण में रहता है। कोई-कोई उसे पहचान पाता है। जिस पर वह दयालु होता है, उसका सब कुछ ले जाता है। 

स्वामी रामतीर्थ ने कहा था, ‘गोपियों के इससे बढ़ कर क्या सुकर्म होंगे कि कृष्ण ने उनका मक्खन चुराया। धन्य है, जिसका सब कुछ चुराया जाए। मन चित्त तक बाकी न रहे।’ मतलब यह कि वह फालतू की चीजें हर लेता है। चाहता है कि शुद्ध-बुद्ध मन से उसे अपनाओ, आत्मसात कर लो। गोपियों का परिष्कार भी इसी भांति हुआ था। पहले तो वंशी बजा कर बेसुध कर दिया, वे भागी चली आईं, फिर पूछा, ‘क्यों आई हो! जाओ लौट जाओ।’ विमूढ़-सी वे ताकती रह गईं। मन ही मन समझ गईं कि छलिया परीक्षा ले रहा है। 

यदि अब भी कहीं लौकिक राग है तो वापस जाओ। संस्कारित होकर आना। समर्पण में किसी और के लिए स्थान नहीं। जरा भी चूके तो वह बुक्कल की गिरफ्त से छूट जाएगा। गोपियों ने इसी त्रिभंगी मुद्रा को हृदय में बसा लिया था। आड़े-तिरछे अड़ा लिया था, अब कैसे भी निकल नहीं पाएगा: ‘उर में माखन चोर गड़े, अब कैसे हू निकसत नाहीं तिरछे ह्वै जू उड़े।’

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