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जन्म कुंडली में केतु की स्थिति हो ऐसी तो मिलता है शुभ फल, जानिए क्रूर ग्रह का मनुष्य जीवन पर प्रभाव

 वैदिक ज्योतिष में राहु केतु की तुलना सर्प से की गई है। राहु को उसका सिर और केतु को उसका पूंछ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, केतु ग्रह को अशुभ माना जाता है। हालांकि क्रूर ग्रह केतु...

Saumya Tiwari लाइव हिन्दुस्तान टीम, नई दिल्लीFri, 30 Oct 2020 08:28 AM
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जन्म कुंडली में केतु की स्थिति हो ऐसी तो मिलता है शुभ फल, जानिए क्रूर ग्रह का मनुष्य जीवन पर प्रभाव

 वैदिक ज्योतिष में राहु केतु की तुलना सर्प से की गई है। राहु को उसका सिर और केतु को उसका पूंछ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, केतु ग्रह को अशुभ माना जाता है। हालांकि क्रूर ग्रह केतु हमेशा अशुभ फल ही देता है, ऐसा भी नहीं है। केतु ग्रह व्यक्ति को शुभ फल भी देता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, केतु को अध्यात्म, वैराग्य, मोक्ष, तांत्रिक आदि का कारक माना गया है। राहु को किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं मिला है, लेकिन धनु राशि में केतु की उच्च राशि है, जबकि मिथुन राशि में यह नीच भाव में होता है।

केतु की उच्च राशि धनु होने के कारण यह इस राशि के जातकों को शुभ फल देता है। वैदिक ज्योतिष में केतु को मंगल के समान माना जाता है, इसलिए मंगल की राशि (मेष और वृश्चिक) में होने पर भी बुरा फल नहीं देता है। अगर जन्म कुंडली में भावों में केतु के फल की बात करें तो केतु दूसरे और आठवें भाव का कारक है। इसलिए यह कुंडली के इन भावों में होने पर शुभ फल ही देता है। अन्य भावों में केतु अशुभ फल देते हैं।

केतु ग्रह का मनुष्य जीवन पर प्रभाव-

1. ज्योतिष में केतु ग्रह की कोई निश्चित राशि नहीं है। ऐसे में केतु जिस राशि में गोचर करता है वह उसी के अनुरूप फल देता है। इसलिए केतु का प्रथम भाव अथवा लग्न में फल को वहां स्थित राशि प्रभावित करती है। इसके प्रभाव से जातक अकेले रहना पसंद करता है लेकिन यदि लग्न भाव में वृश्चिक राशि हो तो जातक को इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। 
2. अगर किसी जातक की कुंडली में केतु तृतीय, पंचम, षष्टम, नवम एवं द्वादश भाव में हो तो जातक को इसके बहुत हद तक अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। 
3.  अगर केतु गुरु ग्रह के साथ युति बनाता है तो व्यक्ति की कुंडली में इसके प्रभाव से राजयोग का निर्माण होता है। 
4.  अगर जातक की कुंडली में केतु बली हो तो यह जातक के पैरों को मजबूत बनाता है। जातक को पैरों से संबंधित कोई रोग नहीं होता है। शुभ मंगल के साथ केतु की युति जातक को साहस प्रदान करती है।
5. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंडली में केतु के नीच का होने से जातक को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। व्यक्ति के सामने अचानक कोई न कोई बाधा आ जाती है। 
6. अगर व्यक्ति किसी कार्य के लिए जो निर्णय लेता है तो उसमें उसे असफलता का सामना करना पड़ता है। केतु के कमजोर होने पर जातकों के पैरों में कमजोरी आती है। 
7. पीड़ित केतु के कारण जातक को नाना और मामा जी का प्यार नहीं मिल पाता है। राहु-केतु की स्थिति कुंडली में कालसर्प दोष बनाती है।

(इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।)
 

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