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इस विशेष संयोग में 14 नहीं, 15 जनवरी को मनेगी मकर संक्रांति

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वर्ष 2019 में मंगलवार 15 जनवरी को मकर(तिल) संक्रांति मनायी जायेगी। शुक्ल पक्ष नवमी मंगलवार को ही भगवान भास्कर का राशि परिवर्तन होगा। वे धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के मकर राशि में पहुंचने पर मकर संक्रांति मनाने की परंपरा है। मकर संक्रांति पर गंगास्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इसके साथ ही माघ स्नान की भी शुरुआत हो जाएगी। सनातन धर्म में मकर संक्रांति की काफी महत्ता है। मान्यता है कि इसी तिथि पर भीष्म पितामह को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसके साथ ही सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण हो जाएंगे और खरमास समाप्त हो जाएगा। प्रयाग में कल्पवास भी मकर संक्रांति से शुरू होगी। 

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ज्योतिषाचार्य डा.राजनाथ झा के मुताबिक नए वर्ष में सोमवार 14 जनवरी की मध्य रात्रि में सूर्य का मकर में संक्रमण होगा। जबकि मंगलवार 15 जनवरी को 12 बजे से पुण्यकाल है। इस लिहाज से मंगलवार की सुबह से ही संक्रांति स्नान,दान शुरू हो जायेगा। कहा गया है कि सूर्यास्त से पहले सूर्य का संक्रमण हो तो उसी तिथि व दिन मकर संक्रांति मनाना शास्त्रसम्मत है। इसी तिथि पर स्नान,दान,तिल ग्रहण,कंबल दान करना अति शुभ है। आचार्य मार्कण्डेय शारदेय ने बनारसी पंचांगों के हवाले से बताया कि 14जनवरी की रात मध्य रात्रि के बाद सूर्य का संक्रमण होने से मंगलवार को ही मकर संक्रांति मनाना शास्त्र सम्मत है। उनके अनुसार इसके पूर्व में भी 12 और 13 जनवरी को मकर संक्रांति मनायी जाती रही है। स्वमी विवेकानंद के जन्म पर 12 जनवरी को मकर संक्रांति मनी थी। आने वाले 70 वर्षों में 16 -17 जनवरी को भी मकर संक्रांति होगी। 

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ज्योतिषाचार्य इंजीनियर प्रशांत कुमार के अनुसार मकर के स्वामी शनि और सूर्य के विरोधी राहू होने के कारण दोनों के विपरीत फल के निवारण के लिए तिल का खास प्रयोग किया जाता है। उत्तरायण में सूर्य की रोशनी में और प्रखरता आ जाती है। तिल से शारीरिक, मानसिक और धार्मिक उपलब्धियां हासिल होती हैं। तिल विष्णु को प्रिय है और यह गर्म भी होता है। तिल के दान और खिचड़ी खाने से विष्णु पद की प्राप्ति होती है। .

ज्योतिषाचार्य विपेंद्र झा माधव के अनुसार मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन ही महर्षि प्रवहण को प्रयाग के तट पर गंगा स्नान से सूर्य भगवान से पांच अमृत तत्वों की प्राप्ति हुई थी। ये तत्व हैं-अन्नमय कोष की वृद्धि, प्राण तत्व की वृद्धि, मनोमय तत्व यानी इंद्रीय को वश में करने की शक्ति में वृद्धि, अमृत रस की वृद्धि यानी पुरुषार्थ की वृद्धि, विज्ञानमय कोष की वृद्धि यानी तेजस्विता और भगवत प्राप्ति का आनंद। .

आचार्य पीके युग के मुताबिक सूर्य मकर से मिथुन राशि तक उत्तरायण में और कर्क से धनु राशि तक दक्षिणायण रहते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायण को देवताओं का रात्रि कहा जाता है। यह भी मान्यता है कि दिवगंत आत्माएं भी उत्तर दिशा में हो जाती हैं जिससे उन्हें देवताओं का सानिध्य मिलता। भीष्म ने भी अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी।

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  • Web Title:In this special coincidence on January 15 Makar Sankranti will be celebrated