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28 अक्तूबर, 2020|8:39|IST

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इस दिन हुआ कान्हा के बड़े भाई बलराम का जन्म, हल की होती है पूजा

द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से पहले शेषनाग ने बलराम जी के अवतार में जन्म लिया था। भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष षष्ठी को बलराम जी के जन्म के उपलक्ष्य में हरछठ व्रत मनाया जाता है। इस व्रत को हलषष्ठी, हलछठ, हरछठ व्रत, चंदन छठ, तिनछठी भी कहा जाता है। रक्षाबंधन और श्रवण पूर्णिमा के छह दिन बाद बलराम जयंती मनाई जाती है। गुजरात में इस त्योहार को चंद्र षष्ठी के रूप में जाना जाता है और ब्रज क्षेत्र में बलदेव छठ को रंधन छठ के रूप में मनाया जाता है।

कहा जाता है कि जब कंस ने देवकी-वासुदेव के छह पुत्रों को मार डाला, तब माता देवकी के गर्भ में भगवान बलराम पधारे। योगमाया ने उन्हें आकर्षित कर नंद बाबा के यहां निवास कर रहीं श्री रोहिणीजी के गर्भ में पहुंचा दिया। इसलिए उनका एक नाम संकर्षण पड़ा। बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है। संतान की लंबी आयु के लिए माताएं हलषष्ठी व्रत रखती हैं। बलराम जी का अस्त्र हल होने के कारण इस दिन हल का पूजन किया जाता है। इस व्रत में हल से जुते हुए अनाज व सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता है। इस व्रत में गाय का दूध व दही प्रयोग में नहीं लाया जाता है। इस व्रत में घर की दीवार पर हरछठ माता का चित्र बनाया जाता है। भगवान श्रीगणेश एवं माता गौरा की पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।