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गुरु पूर्णिमा विशेष: जीवन में सजगता लाते हैं गुरु

गुरु पूर्णिमा

एक बार की बात है। एक संत के पास एक चोर आया। वह उनका शरणागत होना तो चाहता था, लेकिन अपनी चोरी नहीं छोड़ना चाहता था। तो, उन संत ने उसे इजाजत दी और कहा, ‘तुम चोरी तो कर सकते हो, लेकिन अगली बार जब तुम चोरी करो तो पूर्ण सजगता के साथ चोरी करना।' तो, उस चोर ने सोचा कि यह तो बहुत आसान है, क्योंकि चोरी तो मेरी आदत है, सजगता के साथ चोरी करना कौन सी बड़ी बात है। लेकिन हुआ यूं कि अगली बार जब वह चोरी के लिए तैयार हुआ तो उसे संत की बात याद आ गई और वह अपने कृत्य के प्रति सजग हो गया। नतीजा यह हुआ कि वह चोरी नहीं कर सका।

उस चोर ने सोचा कि समय के साथ संत के आशीर्वाद में कमी आ जाएगी। लेकिन समय बीतने के बाद भी जब वह चोरी के लिए सोचता या किसी घर में चोरी के लिए घुसता, उसे संत की वाणी याद आ जाती और वह फिर चोरी नहीं कर पाता था। सजगता में बड़ी शक्ति है। यह आप में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती है। सभी गलतियां असजगता में होती हैं, लेकिन सजगता में कोई नाराज भी नहीं हो सकता, न गलती कर सकता है और न ही कोई शिकायत। ऐसा तभी होता है, जब आपका मन दुनियावी बातों और उलझनों से हटकर, अपनी अंतरात्मा से जुड़ गया हो। जब हमें किसी चीज का ज्ञान होता है, तब चीजों को संभालना आसान हो जाता है। जब हम जिन्दगी के बारे में थोड़ा-बहुत समझ लेते हैं या जान लेते हैं तो चीजों को संभालना आसान हो जाता है।.

जब एक शिष्य के जीवन में गुरु का आगमन होता है, तब उसकी परमसत्य के बारे में भी सजगता बढ़ जाती है। गुरु आपको अच्छे से मथते हैं, ताकि आपका सर्वांगीण विकास हो सके और आप दिव्यता के साथ एकाकार हो सकें। गुरु तपती धूप में या भयंकर तूफान में घिरे होने पर उस कुटिया की तरह है, जिसके भीतर जाकर आपको सुकून प्राप्त होता है।

गुरु ज्ञान का खजाना लिए हुए स्वयं प्रकाश की तरह है। साधक के लिए गुरु जीवन शक्ति के समान है। जैसे एक बीज पहले एक कली और फिर फूल बनता है, ठीक वैसे ही गुरु भी हमें बड़ी सुन्दरता के साथ अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ाते हैं। गुरु का जीवन में होना हममें सुरक्षा का भाव जगाता है। गुरु एक तत्व है, हमें गुरु को शारीरिक स्तर पर ही महसूस नहीं करना चाहिए।

संत कनकदास के बारे में एक बहुत ही सुंदर कहानी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अपने जीवन में गुरु की उपस्थिति को कैसे महसूस किया जाना चाहिए। एक बार कनकदास के गुरु ने उनको और अन्य भक्तों को एकादशी का उपवास तोड़ने के लिए एक केला दिया, इस शर्त पर कि इसे केवल तभी खाया जाए, जब कोई नहीं देख रहा हो। अगले दिन शिष्यों ने अपने केला खाने के तरीकों का वर्णन किया। लेकिन कनकदास केला लेकर वापस गुरु के पास आ गए। जब उनसे पूछा गया तो कनकदास ने कहा कि जब भी उन्होंने केला खाने की कोशिश की, हर वक्त, हर घड़ी और हर जगह उन्हें उनके गुरु की उपस्थिति महसूस हुई और वह केला नहीं खा सके।

इस अनुभव को हम सान्निध्य कहते हैं। इस अवस्था में सारे दुख, सारी शिकायतें दूर हो जाती हैं और हम पूरी सजगता के साथ अपने कार्य में लग जाते हैं। इस विश्वास के साथ कि कोई शक्ति है, जो हर क्षण, हर घड़ी हमारा ध्यान रख रही है। फिर प्रश्न उठता है कि हम उस परम शक्ति के साथ कैसे जुड़ाव महसूस करें? हम कैसे उन गुरु को ढूंढें, जो हमें उस प्रकाश की अनुभूति करा सके? इस प्रश्न का उत्तर देना बेहद कठिन है। आपको अपनी अंत: प्रज्ञा के माध्यम से ही इसका अनुभव करना होगा।

एक बार, राजभवन में एक बहुत ही जानकार और सम्मानित शिक्षक आए। वह एक महान वक्ता भी थे। राजा समेत सभी ने उनका सम्मान किया, लेकिन वह कुछ खालीपन महसूस कर रहे थे और गुरु की खोज में थे। वह एक गुरु को समर्पण करने के लिए उत्सुक थे। जब वह अपने गुरु को खोजने के लिए निकल रहे थे तो राजा ने उन्हें अपनी पालकी भेंट की। जब वह अपने गंतव्य पर पहुंचे तो यह पता चला कि पालकी उठाने वाले व्यक्ति में से एक उनके गुरु थे, जिन्हें वह ढूंढ़ रहे थे। गुरु को पाने की उनकी तड़प इतनी थी कि वह स्वयं गुरु को उनके पास खींच कर ले आई।.

अगर गुरु को पाने की तड़प आपके मन में उठ गई है तो गुरु आपके जीवन में आ ही जाएंगे। अगर आप गुरु की ओर एक कदम बढ़ाते हैं तो गुरु आपकी ओर सौ कदम बढ़ाते हैं। लेकिन पहला कदम शिष्य को ही उठाना पड़ता है। अपने गुरु के जितने निकट आप आते जाएंगे, उतने ही आप खिलते चले जाएंगे। आप में ज्ञान, प्रेम और नयापन बढ़ता ही चला जाएगा। इस गहराई का कोई तल नहीं है। यही गुरु पूर्णिमा का महत्व है, अपने गुरु के प्रति कभी न समाप्त होने वाला और बिना किसी शर्त का संबंध रखना।

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  • Web Title:Guru Purnima 2018 guru brings vigilance in life