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आस्था: वैष्णव मंदिरों में सबसे पवित्र है विष्णुपद मंदिर, पितरों को मोक्ष दिलाने की करते हैं कामना

मोक्षदायिनी फल्गु किनारे स्थित भगवान विष्णु के चरण चिह्न वाला विष्णुपद मंदिर दर्शन-पूजन के साथ ही पिंडदान के लिए विशेष महत्व रखता है। वैष्णव मंदिरों में यह सबसे अधिक पवित्र माना जाता है। इसी कारण यहां सालों भर देश के कोने-कोने से सनातन धर्मावलंबी आते हैं। आश्विन के पितृपक्ष में लाखों पिंडदानी मंदिर परिसर में स्थित वेदियों पर पितरों को मोक्ष दिलाने की कामना करते हैं। यहां सोलह वेदियों के अलावा रूद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद पर खीर से पिंडदान का विधान है। श्रद्धालु विष्णुचरण पर तुलसी के पत्ते चढ़ाकर महामत्युंजय पाठ भी करते  हैं। यहां प्रतिदिन रात में विष्णुचरण का भव्य तरीके से श्रृंगार और पूजा होती है।

इस मंदिर का निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1766 में कराया था। जयपुर के शिल्पकारों ने काले ग्रेनाइट पत्थरों को तराशकर इसे बनाया है। मंदिर का गुंबज पहाड़ी गुफा की आकृति में आठ पहल वाली है। जमीन से गुंबज की ऊंचाई 100 फुट है। मंदिर के गर्भगृह में 13 ईंच लंबा भगवान विष्णुचरण का चरण चिह्न है। मंदिर के ऊपर में एक मन सोने का ध्वज कलश है। गर्भगृह में चांदी से अष्टकोण कुंड बना है। पिछले दो-तीन सालों में मंदिर के मुख्य दरवाजा और निकास द्वार चांदी का हो गया है।

धर्मशिला पर स्थित भगवान विष्णु का चरण चिह्न
श्री विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक ने बताया कि विष्णुपद मंदिर के गर्भगृह में जिस पत्थर पर भगवान विष्णु का चरण चिह्न अंकित हैं उसे धर्मशिला कहा जाता है। गया महात्म्य के अनुसार इस पत्थर को स्वर्ग से लाया गया था। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने यहां गयासुर नामक राक्षस के शरीर पर यज्ञ किया था। इसके बाद से इसकी पूजा शुरू हुई। किवदंती यह है कि गयासुर की तपस्या के बाद उसे मिले वर से जब देवता चिंतत हुए तो छल से उसके शरीर को पवित्र यज्ञ करने के लिए मांगा। गयासुर से इसे सहज स्वीकार कर लिया। चंचल स्वभाव  के कारण वह यज्ञ के दौरान स्थिर नहीं रह रहा था। इसके बाद भगवान विष्णु को बुलाया गया और एक विशाल शिला मंगायी गयी। उस शिला को गयासुर की छाती पर रखकर गया विष्णु ने उसपर अपना पैर रखा। इसके बाद से ही चरण चिह्न का निशान पत्थर पर है। गयासुर ने भगवान से वर मांगा कि जितनी जमीन पर वह लेटा है (शरीर है) उसे सर्वाधिक पवित्र माना जाए। इसपर पिंड देने से पितरों को मोक्ष मिले। भगवान से ऐसा वरदान दिया। तब से गया में पिंडदान सुविख्यात हो गया।

सालों भर हजारों श्रद्धालु 13 ईंच लंबे विष्णुचरण पर टेकते हैं मत्था : गयापाल
गयापाल शंभू लाल विट्ठल ने बताया कि पुरातत्व निदेशालय की ओर सुरक्षित स्मारकों में से एक इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के 13 ईंच लंबा चरणचिह्न है। पिंडदानियों के अलावा सालों भर हजारों श्रद्धालु चांदी से बने अर्घ में पत्थर पर अंकित भगवान विष्णुचरण के दर्शन और पूजन करते हैं। हर दिन रात में विष्णुपद का विशेष रूप से श्रृंगार होता है। 30 ऊंची अष्टभुजी काले ग्रेनाइट पत्थरों को तराशकर बनाए गए यह वास्तुकला के हिसाब से भी दर्शनीय है।

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  • Web Title:Gaya Vishnupad Temple is most Holy of Vaishnava temples
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