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Ganesh Chaturthi 2018: कल है गणेश चतुर्थी, जानिए इस दिन क्यों नहीं करते चंद्र दर्शन

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गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मनाया जाता है। इस बार गणेश चतुर्थी 13 सितंबर यानी कल से आरंभ हो रहा है, जो 23 सितंबर तक चलेगा। भगवान गणेश को अपने घर में प्रतिष्ठापित करने से सारे कष्ट मिट जाते हैं।  गणपति महाराज विघ्नों को दूर करने वाले देव हैं। कहा जाता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन नहीं करने चाहिए। धर्म ग्रंथों में इसका जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि इस रात को चंद्र दर्शन करने से झूठे आरोप लगते हैं। इश संबंध में ग्रंथों में दो कथाओं का उल्लेख है। पहली कथा यह बताती है कि चंद्र दर्शन क्यों नहीं करना चाहिए जबकि दूसरी कथा को सुनने से भूलवश हुए चंद्र दर्शन का दोष नहीं लगता।

श्रीगणेश ने दिया था चंद्रमा को श्राप 

एक बार गणेश जी सत्यलोक का विचरण करते हुए चंद्रलोक पहुंच गए। तब चंद्रमा उन्हें देख मंद-मंद मुस्कुराता रहा। उसे अपने सौंदर्य पर अभिमान था। गणेश जी समझ गए कि चंद्रमा अभिमान वश उनका उपहास कर रहा है। क्रोध में आकर भगवान श्रीगणेश ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि आज से तुम काले हो जाओगे। चंद्रमा को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने श्रीगणेश से क्षमा मांगी तो गणेशजी ने कहा सूर्य के प्रकाश को पाकर तुम एक दिन पूर्ण हो जाओगे लेकिन आज का यह दिन तुम्हें दंड देने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। 

भगवान श्रीकृष्ण पर लगा था चोरी का आरोप 

सत्राजित् नाम के एक यदुवंशी ने सूर्य भगवान को तप से प्रसन्न कर स्यमंतक नाम की मणि प्राप्त की थी। वह मणि प्रतिदिन स्वर्ण प्रदान करती थी। उसके प्रभाव से पूरे राष्ट्र में रोग, अनावृष्टि, अग्नि आदि का डर नहीं रहता था। एक दिन सत्राजित् राजा उग्रसेन के दरबार में आया। वहां श्रीकृष्ण भी उपस्थित थे। श्रीकृष्ण ने सोचा कि कितना अच्छा होता यह मणि अगर राजा उग्रसेन के पास होती। किसी तरह यह बात सत्राजित् को मालूम पड़ गई इसलिए उसने मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। एक दिन प्रसेन जंगल गया वहां एक शेर ने उसे मार डाला। जब वह वापस नहीं लौटा तो लोगों ने यह आशंका जताई कि श्रीकृष्ण उस मणि को चाहते थे इसलिए प्रसेन को मारकर उन्होंने ही वह मणि ले ली होगी। लेकिन मणि शेर के मुंह में रह गई। जाम्बवान ने शेर को मारकर मणि ले ली जब श्रीकृष्ण को यह मालूम पड़ा कि उन पर झूठा आरोप लग रहा है तो वे सच्चाई की तलाश में जंगल गए।

वे जाम्बवान की गुफा तक पहुंचे और जाम्बवान से मणि लेने के लिए उसके साथ 21 दिनों तक घोर संग्राम किया। अंत में जाम्बवान समझ गया कि श्रीकृष्ण तो उनके प्रभु हैं त्रेता युग में श्रीराम के रूप में वे उनके स्वामी थे। जाम्बवान ने तब खुशी-खुशी वह मणि श्रीकृष्ण को लौटा दी व अपनी पुत्री जाम्बवंती का विवाह श्रीकृष्ण से करवा दिया।  श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित् को सौंप दी। सत्राजित् ने भी खुश होकर अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

ऐसा माना जाता है कि इस प्रसंग को सुनने-सुनाने से भाद्रपद मास की चतुर्थी को भूल से चंद्र-दर्शन होने का दोष नहीं लगता। 

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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