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गणेश चतुर्थी विशेष: ज्यादा सिद्ध माने जाते है इस दिशा में सूंड वाले गणपति

गणेश चतुर्थी

भाद्रपद माह में शुक्ल चतुर्थी के दिन मध्याह्न काल में श्रीगणेश का जन्म हुआ था। भगवान श्रीगणेश ऋद्धि-सिद्धि और सौभाग्य के देवता हैं, इन्हें सबसे पहले पूजे जाने का वरदान प्राप्त है। उनके जन्मोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। इस बार यह 13 सितंबर को है। गणपति की आराधना जितनी सरल है उतनी ही कठिन भी है। गणपति की प्रतिमा को लेकर एक जिज्ञासा हमेशा रहती है कि उनकी सूंड किस दिशा में होना चाहिए। कई बार भगवान गणेश की मूर्ति की कहीं दाईं ओर तो कहीं बाईं ओर सूंड दिखाई देती हैं। लेकिन बाईं ओर सूंड वाले गणपति ज्यादा सिद्ध माने जाते हैं। 

जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ बाईं ओर हो, उसे वाममुखी कहते हैं। वाम यानी बाईं ओर या उत्तर दिशा। बाई ओर चंद्र नाड़ी होती है। यह शीतलता प्रदान करती है एवं उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक है। माना जाता है कि बाईं ओर की सूंड किए गणपति हमेशा ही सकारात्मक नतीजे देते हैं। वैसे भी गणपति को बुद्धि का देवता कहा जाता है। यदि विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो बुद्धि दो भागों में बटीं होती है। इन्हें विशेष विधि विधान की जरुरत नहीं लगती। यह शीघ्र प्रसन्न होते हैं। थोड़े में ही संतुष्ट हो जाते हैं। त्रुटियों पर क्षमा करते हैं।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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