ज़कात, सदके और सवाब की ईद

फजले गुफरान नई दिल्ली
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तीस दिन के रोज़ों (उपवास) की आध्यात्मिक यात्रा के बाद अब ईद आने वाली है। रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का नवां महीना है। इस महीने के गुजरने के बाद शव्वाल की पहली तारीख को ईद-उल-फित्र मनाई जाती है। ईद...

ज़कात, सदके और सवाब की ईद

तीस दिन के रोज़ों (उपवास) की आध्यात्मिक यात्रा के बाद अब ईद आने वाली है। रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का नवां महीना है। इस महीने के गुजरने के बाद शव्वाल की पहली तारीख को ईद-उल-फित्र मनाई जाती है। ईद के दिन नमाज से पहले घर में खजूर या कोई भी मीठी चीज खाते हैं, क्योंकि ये भी सुन्नत (पैगंबर साहब के काम का अनुसरण करना) है। ईद पैगंबर हजरत मोहम्मद (स.) के जमाने से मनाई जाती है।.

रोज़ों और इबादत के महीने में सिर्फ मनुष्यता का पाठ ही नहीं पढ़ाया जाता, बल्कि उस पर अमल करना भी सिखाया जाता है।

यह वह महीना भी है, जब कुरान नुज़ूल यानी अवतरण हुआ था, इसलिए पूरे महीने लोग पवित्र कुरान का पाठ करते हैं। पांच वक्त के अलावा नमाज-ए-तरावीह पढ़ी जाती है। इस्लाम की मान्यता के अनुसार रमज़ान महीने की 27वीं रात यानी शब-ए-क़द्र को कुरान का नुज़ूल हुआ था। यही वजह है कि इस महीने हर एक मोमिन को कम से कम एक बार पूरी कुरान पढ़ने की हिदायत दी जाती है। .

हर एक रोज़ादार के लिए जरूरी है कि अल्लाह की इस तौफीक को पाने के लिए वह जरूरतमंदों को फितरा दे। इसीलिए ईद को ईद-उल-फित्र के नाम से भी जाना जाता है। वैसे ज़कात (दान) सदका (पवित्र कमाई को न्योछावर) और ख़ैरात (भिक्षा/मुफ्त में अन्न-वस्त्र बांटना) दें। इसके अलावा आचरण संयमित और पवित्र रखें। नेक बात को सच तस्लीम करें और जानें भी, मानें भी।.

एक बात पवित्र कुरान में बार-बार कही गई है- वह है दान, दक्षिणा और सवाब यानी (पुण्य) के कार्य। इसी तरह से पवित्र कुरान में सुलह करने वालों और शांति की राह पर चलने वालों की बेहद प्रशंसा की गई है। कहा गया है कि ऐसे लोगों को खुदा बेहद पसंद करता है, जबकि फसाद करने वालों के लिए बार-बार सख्त बातें कही गई हैं। यहां तक कहा गया है कि फितना करने वाले, नफरत फैलाने वालों के साथ सख्त रवैया अपनाना जरूरी है। .

खुशी के दिन ईद से पहले रोज़ों और इबादत के इस महीने में मनुष्यता का पाठ ही नहीं पढ़ाया जाता, उस पर अमल करना भी सिखाया जाता है। जब आप ये सब करते हैं, तब आपकी वास्तविक ईद मानी जाती है। .

रमजान की समाप्ति ईद के त्योहार की खुशी लेकर आती है। नए कपड़ों पर ‘इत्र' भी लगाया जाता है तथा सिर पर टोपी पहनी जाती है। उसके बाद लोग अपने-अपने घरों से ‘नमाजे दोगाना' पढ़ने ईदगाह या मस्जिद जाते हैं। नमाज के बाद इमाम साहब उनको संबोधित करते हैं, जिसमें बताया जाता है कि अल्लाह एक है व उसकी बड़ी कुदरत है। उसने इस संसार को बनाया है और हम सबको पैदा किया है। मरने के बाद हम सबको अल्लाह के सामने जाना है तो हमें अच्छे कर्म करने चाहिए। अल्लाह की बात मान कर और उसके भेजे हुए नबी हजरत मोहम्मद की बातों को सच्चे दिल से अपनाना चाहिए। .

अपने मन को साफ रखना और अल्लाह की इबादत के साथ उसके बंदों से अच्छा व्यवहार करना ही ईद का सही अर्थ है।

Anuradha Pandey

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Anuradha Pandey
जानें लेटेस्ट Dharm News, Aaj ka Rashifal और सटीक Panchang की जानकारी। अपनी डेली पूजा के लिए यहाँ पढ़ें Shiv Chalisa, Hanuman Chalisa और Bajrang Baanहिंदू कैलेंडर 2026 की शुभ तिथियों के साथ अपने हर दिन को खास बनाएं!