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परमात्मा की प्राप्ति में बाधा है अहंकार

ओशोधारा, मुरथल,सोनीपतSaumya Tiwari
Tue, 26 Oct 2021 10:27 AM
परमात्मा की प्राप्ति में बाधा है अहंकार

जब तक हमारे भीतर अहंकार है, तब तक हमारे भीतर का अंधकार नहीं मिट सकता। और जब तक अंधकार है, तब तक दुख से, अशांति से छुटकारा नहीं हो सकता है। जिस दिन कुछ होने के अहंकार से, कुछ त्यागने के अहंकार से, हर प्रकार के अहंकार से मुक्त हो जाएंगे, उसी दिन से हमारे दुखों का अंत शुरू हो जाएगा। हम अनंत हो जाएंगे।

आदमी की कमजोरी क्या है? अहंकार आदमी की कमजोरी है। और जो जितना ज्यादा अहंकार से भरा है, वह उतना ही कमजोर है। और हम सब अहंकार से भरे हैं। हम सब अहंकार से ठोस भरे हैं। हम इतने ज्यादा अहंकार से भरे हैं कि हम में परमात्मा के प्रवेश की कोई संभावना नहीं है। जो मनुष्य अहंकार से भरा है, वह सत्य को नहीं जान सकेगा, क्योंकि सत्य के लिये चाहिए खाली और शून्य मन। और जो अहंकार से भरा है, वह बिल्कुल भी खाली नहीं है, जहां कि परमात्मा की किरणें प्रवेश पा सकें, जहां कि सत्य प्रवेश पा सके और स्थान पा सके। मनुष्य के अहंकार के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है।

यह अहंकार क्या है? इस अहंकार से मुक्ति का उपाय क्या है? जो अहंकार से मुक्त होता है, वही केवल शून्य होता है, और कोई शून्य नहीं हो सकता। शून्य का अर्थ है, अहंकार से शून्य हो जाना। यह हमारा ‘मैं’ क्या है? जीवन भर हम इस ‘मैं’ के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं, इसी मैं के आस-पास जीते हैं। हमारे भवन खड़े होते हैं इसी मैं की रक्षा के लिए। हमारे धन के पहाड़ खड़े होते हैं इसी मैं की रक्षा के लिए। यश और पद की प्रतिष्ठा की दौड़ होती हैं, इसी मैं की रक्षा के लिए। और न केवल यह, बल्कि हम त्याग करते हैं, उपवास करते हैं और पूजा करते हैं, इस मैं की रक्षा के लिए; और मंदिर खड़े करते हैं इस मैं की रक्षा के लिए। सारे मंदिर भगवानों के मंदिर नहीं हैं, बनाने वाले लोगों के मंदिर हैं।

मनुष्य का अहंकार बहुत अद्भुत है। यह जो हमारा मैं है, मोक्ष तक हमारा पीछा करता है। मोक्ष भी इसके लिए हम खोजते और तलाशते हैं। यह मैं है क्या? एक आदमी तप कर सकता है, और तपश्चर्या मैं के लिये दौड़ है, मैं को भरने की, मैं को पूरा करने की। और जब आदमी थक जाता है और परेशान हो जाता है और पाता है कि यह मैं दुख ही देता है, कोई सुख नहीं लाता है; पीड़ा ही लाता है, कोई आनंद नहीं लाता; तो यह भी हो सकता है कि वह मैं को छोड़ने में लग जाए। और वह कहे, मैं को अब छोड़ दूंगा। अहंकार से मुक्त हो जाऊंगा। मैं विनम्र हो जाऊंगा। मैं वस्त्र छोड़ दूंगा, नग्न हो जाऊंगा। जंगलों में चला जाऊंगा, भिखारी हो जाऊंगा!

लेेकिन कौन हो जाएगा भिखारी? कौन चला जाएगा जंगल में? कौन करेगा त्याग? और जब त्याग किया जाएगा और भिखारी हो जाएंगे और जंगल में चले जाएंगे, तब भी ‘मैं’ तृप्त होगा कि मैंने किया त्याग। मुझसे बड़ा त्यागी और कोई भी नहीं है। और अगर कोई खबर ले आएगा कि तुमसे भी बड़ा त्यागी पैदा हो गया है, तो ईर्ष्या वापस लौट आएगी। अहंकार बड़ा अद्भुत है, बड़ा अनूठा है। उसके रास्ते बड़े सूक्ष्म हैं। और हम छोड़ें या भरें, वह हमेशा मौजूद रहता है।

क्या किया जाए? कैसे इस अहंकार से छुटकारा हो? और इससे छुटकारा न हो, तो आदमी का दुख से भी छुटकारा नहीं हो सकता है। अशांति से भी छुटकारा नहीं हो सकता है। अज्ञान से भी छुटकारा नहीं हो सकता है। इस मैं की रक्षा में निरंतर कोशिश करते रहे हैं और दूसरे के मैं पर हमला करते रहे हैं, क्योंकि सब रक्षा अंत में आक्रमण बन जाती है। यह जो हमारा मैं है, इसकी सुरक्षा के लिए हम जो भी उपाय करते हैं, वह दूसरों पर आक्रमण बन जाता है। सुरक्षा की भावना आक्रमण ले आती है। चाणक्य ने बहुत पहले कहा था,- सुरक्षा का सबसे अच्छा उपाय है आक्रमण।

अहंकार से हिंसा पैदा होती है। फिर चाहे कोई पानी छानकर पीए और मांस न खाए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ सकता है। चाहे कोई कुछ भी करे, जहां अहंकार है, वहां हिंसा है, क्योंकि अहंकार आक्रामक है। वह दूसरे को दबाना चाहता है, तभी वह तृप्त होता है, नहीं तो तृप्त नहीं होता।

अहंकार बीच का भ्रम है। जो जिंदगी को पूरा नहीं देख पाता है, उसको यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मैं कुछ हूं। क्या हूं मैं? इसका तो कोई पता नहीं है हमें, लेकिन मैं कुछ हूं, इसका भ्रम जरूर है। खुद भी पता नहीं है कि मैं कौन हूं, लेकिन दूसरे पर हम दावा करते हैं कि जानते नहीं, मैं कौन हूं? क्या पता है हमें अपने सम्बंध में? क्या हैं हम? कितनी सामर्थ्य और शक्ति है हमारी? क्या सत्ता है हमारी? लेकिन हम बहुत अद्भुत हैं और हम बड़ी तरकीब से अहंकार के जाल को बुनते हैं और बनाते हैं।

श्वास आती है और जाती है। लेकिन हम कहते हैं, मैं श्वास ले रहा हूं। आप अगर श्वास ले रहे हैं, तब तो मौत कभी आ न सकेगी, क्योंकि मौत खड़ी रहेगी, आप श्वास लिए जाना! फिर मौत को वापस लौट जाना पड़ेगा। नहीं, लेकिन हम जानते हैं, जो श्वास बाहर जाएगी, वह अगर भीतर न लौटी तो हम लौटा न सकेंगे। लेकिन फिर भी हम कहते हैं, ‘मैं श्वास ले रहा हूं।’ श्वास आती है, जाती है, यह तो सत्य है, लेकिन ‘मैं श्वास ले रहा हूं’, यह बिल्कुल असत्य है।

इस अहंकार के असत्य से जो अपने जीवन के भवन को भर लेता है, वह प्रभु के सत्य से वंचित रह जाता है। यह पहली खूंटी है और सबसे मजबूत खूंटी है। इस खूंटी के न होने को समझ लेना जरूरी है, इस खूंटी के असत्य को समझ लेना जरूरी है। इस खूंटी का जो मिथ्यात्व है, वह समझ लेना जरूरी है। और यह समझ में आ जाए कि ‘मैं’ एक झूठी इकाई है, तो तत्क्षण जीवन अनंत की ओर उन्मुख हो जाता है।

 

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