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15 नवंबर, 2020|10:35|IST

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जानें दीपावली पर क्यों होती है मां लक्ष्मी की पूजा, माता लक्ष्मी के गजलक्ष्मी स्वरूप की पूजा है प्रचलित

 lakshmi-ganesh

दीपावली पर पूजी जाने वाली धन-संपदा की देवी लक्ष्मी की प्राचीन छवि गजलक्ष्मी बुन्देलखण्ड के ललितपुर के देवगढ़ स्थित विश्व प्रसिद्ध दशावतार मंदिर के एक स्तंभ से ली गई है। गजलक्ष्मी (जिसमें लक्ष्मी कमल पुष्प पर विराजमान हैं और उनके दायें-बाएं गज सूंड़ में कलश लिए देवी का जलाभिषेक कररहे हैं)। दशावतार मंदिर का निर्माण पुरातत्वविद 5वीं से 6वीं सदी में मानते हैं। पूरे उत्तर भारत में मां लक्ष्मी के इसी स्वरूप की पूजा दीपावली के दिन होती है।

दीपावली पर क्यों होती है मां लक्ष्मी की पूजा
मां लक्ष्मी धन की देवी हैं, यह हम सभी जानते हैं। मां लक्ष्मी की कृपा से ही ऐश्वर्य और वैभव की प्राप्ति होती है। कार्तिक अमावस्या की पावन तिथि पर धन की देवी को प्रसन्न कर समृद्धि का आशीर्वाद लिया जाता है। दीपावली से पहले आनेवाले शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी के जन्मोत्सव की तरह मनाया जाता है। इसी दिन समुद्रमंथन में देवी प्रकट हुईं थीं। फिर दीपावली पर उनका पूजन कर धन-धान्य का आशीर्वाद लिया है।

दीपावली पर गणपति पूजा का महत्व
गणपति बुद्धि के देवता हैं। हिंदू धर्म में गणपति प्रथम पूज्य हैं यानी उनकी पूजा पहले होती है। दीपावली पर गणपति पूजा की यह भी एक वजह है। साथ ही धन देवी की पूजा से समृद्धि का आशीर्वाद मिलने के बाद व्यक्ति को सद्बुद्धि भी चाहिए। ताकि वह धन का उपयोग सही कार्यों के लिए करे। इसी प्रार्थना के साथ दीपावली पर गणपति की पूजा की जाती है कि हे प्रथम पूजनीय गणपति हमें सद्बुद्धि प्रदान कर सन्मार्ग पर आगे बढ़ने का वरदान दें।

बुंदेलखण्ड में महालक्ष्मी की आराधना का उपनिषद, पौराणिक गाथाओं में वर्णन है। धन और ऐश्वर्य की देवी की प्राचीन छवि गजलक्ष्मी के रूप में ज्यादा मान्य हुई। दशावतार मंदिर के एक स्तंभ पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतार भित्तियों में मूर्ति के रूप में उत्कीर्ण है। इन्ही मूर्तियों के बीच स्तंभ पर गजलक्ष्मी स्वरूप भी है। संभवत: इसी से प्रेरित होकर पूरे उत्तर भारत में मां लक्ष्मी के इसी स्वरूप की पूजा की जाने लगी। देवगढ़ में ही शांतिनाथ जैन मंदिर में 11 वीं सदी की प्राचीन मूर्ति भी है। झांसी स्थित लक्ष्मी मंदिर मध्यकालीन है। इसके अलावा ओरछा, महोबा आदि स्थलों पर भी देवी लक्ष्मी के मंदिर हैं।इतिहासकार डॉ. चित्रगुप्त के शोध के अनुसार देवी महालक्ष्मी के गजलक्ष्मी का चित्रण काल्पनिक है और इस स्वरूप को बुन्देलखण्ड के देवगढ़ स्थित दशावतार मंदिर से लिया गया। मंदिर के स्तंम्भ उकेरी गई कलाकृति प्राचीन है। यहीं से देवी के स्वरूप को मध्यकाल में रंग से चित्रकारी और आधुनिक काल में प्रिंटिंग के जरिये आकर्षक रूप दिया गया है। देश में गजलक्ष्मी का पूजन का विशेष महत्व है।
 

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  • Web Title:Diwali 2020 Gajalakshmi is the only form of worship in Central India on Deepawali