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देवर्षि नारद ने की थी रामायण की रचना में सहायता, वेदों का किया संपादन

बुद्ध पूर्णिमा के एक दिन बाद नारद जयंती मनाई जाती है। देवलोक का दूत कहे जाने वाले देवर्षि नारद, भगवान ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक हैं और भगवान विष्णु के अनन्य भक्त हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया। देवर्षि नारद ज्योतिष के भी प्रधान आचार्य हैं। उन्हें 12 चिरंजीवियों में से एक माना जाता है। उन्हें दुनिया का प्रथम संदेशवाहक माना जाता है। उन्हें अपनी इच्छा से तीनों लोक की यात्रा करने का वर प्राप्त है।

कहा जाता है कि देवर्षि नारद ने रामायण की रचना में सहायता की। उनके द्वारा उच्चारित भगवान राम की कथा को सुनकर ही ऋषि वाल्मीकि ने इस महाकाव्य की रचना की। देवर्षि नारद चलते-फिरते विश्वकोष एवं सार संग्रह हैं। वह त्रिकालदर्शी हैं और उन्होंने वेदों का संपादन किया। प्राणिमात्र के कल्याण की भावना रखने वाले देवर्षि नारद ईश्वरीय मार्ग पर अग्रसर होने की इच्छा रखने वाले प्राणियों को सहयोग प्रदान करते हैं। उनका चयन भगवान विष्णु के कई कार्य पूर्ण करने के लिए किया गया। देवर्षि नारद, वनवास में पांडवों के साथ थे। उन्होंने ही धर्मराज युधिष्ठिर को धर्म व सत्य का मार्ग दिखाया। नारद जी ने भगवान ब्रह्मा द्वारा बताए गए सृष्टि के कार्यों में हिस्सा लेने से मना कर दिया, तब क्रोधित होकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें जीवन पर्यंत अविवाहित रहने का श्राप दिया था। कहते हैं राजा दक्ष के 10 हजार पुत्रों को देवर्षि नारद ने मोक्ष का पाठ पढ़ा दिया, जिससे उनका मन मोह-माया से दूर हो गया। इससे क्रोधित होकर राजा दक्ष ने नारद जी को श्राप दिया कि वह हमेशा इधर-उधर भटकते रहेंगे।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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  • Web Title:Devrishi Narad
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