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छठ पर्व देता है प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

chhath puja 2018

हमारे मनीषियों ने बहुत पहले ही यह अनुमान लगा लिया था कि मानवीय भूल और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ विनाशकारी परिणाम दे सकती है। हाल ही में अपने निधन के कुछ माह पहले ब्रिटेन के सबसे बड़े भौतिक विज्ञानी स्व. स्टीफन हाकिंग्स ने भी चेतावनी दी थी-धरती पर इंसान के रहने का समय समाप्त हो रहा है। इसलिए मानवीय सृष्टि को बचाए रखना है तो मानव दूसरी धरती तलाश लें। इस नतीजे पर पहुंचने के तीन कारण बताए गए थे। पहला, जलवायु में तेजी से हो रहा प्रतिकूल परिवर्तन, दूसरा- जनसंख्या का विस्फोट और तीसरा परमाणु अस्त्र-शस्त्र की होड़।

हमारे मनीषियों का मानना था कि मानव अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। वह अपने परिश्रम और प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित कर किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति को टाल सकता है। छठ पर्व को पूरी तरह प्रकृति संरक्षण की पूजा मानें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मनीषियों ने सूर्योपासना के महत्व और प्रभाव को बताते हुए जब छठ पूजा की परंपरा शुरू की होगी तो उनके जेहन में पर्यावरण संरक्षण का ख्याल सर्वोपरि रहा होगा। इस पर्व में आदमी प्रकृति के काफी करीब तो पहुंचता ही है, उसमें देवत्व स्थापित करते हुए उसे सुरक्षित रखने की कोशिश भी करता है। दीपावली में घरों की सफाई की जाती है तो छठ पर नदियों और जलाशयों की। गांव के पोखर और कुएं तक साफ कर दिए जाते हैं।

काफी मशहूर है पटना की छठ
गंगा नदी के किनारे बसा पटना अब महानगर हो चला है। बड़ी हस्तियों का शहर है। घनी आबादी है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद वह कहीं-कहीं काफी मैली दिखती है लेकिन इस छठ में कोई आकर देखे कि किस तरह समाज के एक-एक व्यक्ति के सहयोग से नदी के सभी घाट चकाचक हो उठे हैं। घाटों की सफाई और सजावट के कारण पटना की छठ काफी मशहूर है। डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ती है। यही स्थिति राज्य और राज्य के बाहर की उन सभी जगहों की है, जहां छठ पूजा होती है।

पर्व के केन्द्र में कृषि और ग्रामीण किसान

ग्रामीण जीवन का यह सबसे बड़ा पर्व माना गया है। इसके केन्द्र में कृषि, मिट्टी और किसान हैं। धरती से उपजी हुई हर फसल और हर फल-सब्जी इसका प्रसाद है। मिट्टी से बने चूल्हे पर और मिट्टी के बर्तन में नहाय-खाय, खरना और पूजा का हर प्रसाद बनाया जाता है। बांस से बने सूप में पूजन सामग्री रखकर अर्घ्य दिया जाता है। एक जगह का सामान दूसरी जगह भेजा जाता है। इस संबंध में एक गीत है....
पटना के घाट पर नारियर किनबे जरूर
हाजीपुर से केरवा मंगाई के अरघ  देबे जरूर
 हियरा के करबो रे कंचन
पांच पुतर, अन-धन, लक्ष्मी  मंगबे जरूर.....।

जल ही जीवन है...
प्रदूषण के खतरों से बचाती है छठ
आज पूरी दुनिया में जल और पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। बिहार ने सदियों पूर्व इसके महत्व को समझा और यही कारण है कि छठ पर्व पर नदी घाटों और जलाशयों की सफाई की जाती है तथा जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य की छाया पानी में साफ-साफ दिखाई पड़नी चाहिए। संदेश साफ है कि जल को इतना निर्मल और स्वच्छ बनाइए कि उसमें सूर्य की किरणें भी प्रतिबिंबित हो उठे। मौजूदा दौर में जल प्रदूषण प्राणियों के जीवन के लिए एक बड़ा खतरा माना जा रहा है।

सूर्य की पराबैगनी किरणों को अवशोषित करती है छठ

छठ सूर्य की पराबैगनी किरणों को अवशोषित कर उसके हानिकारक प्रभावों से बचाती है। वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को धरती की सतह पर सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणें मानक से अधिक मात्रा में टकराती हैं। लोग जल में खड़े होकर जब सूर्य को अर्घ्य देते हैं तो वे किरणें अवशोषित होकर आक्सीजन में परिणत हो जाती हैं, जिससे लोग उन किरणों के कुप्रभावों से बचते हैं। तभी तो प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा हो पाती है और हम चुस्त-दुरुस्त दिखते हैं।
 

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  • Web Title:chhath festival is important for the nature and environmental conservation