Chaturmas - चातुर्मास में इन बातों का रखें ध्यान DA Image

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चातुर्मास में इन बातों का रखें ध्यान

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक रहने वाले चातुर्मास में एक ही स्थान पर रहकर साधना और पूजा-पाठ करना श्रेयकर माना जाता है। जैन धर्म में माना जाता है कि इस दौरान बारिश के मौसम में कई प्रकार के सूक्ष्म जीव सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में मनुष्य के अधिक चलने-उठने के कारण इन जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। इन जीवों को परेशानी न हो इसलिए चातुर्मास में एक ही स्थान पर रहकर साधु-संत भक्तों के बीच अहिंसा, सत्य का ज्ञान बांटते हैं।

मान्यता है कि इन चार माह सात्विक जीवन व्यतीत करना चाहिए। पराए धन पर नजर नहीं रखनी चाहिए। निंदा और क्रोध का त्याग करना चाहिए। चातुर्मास में जलाशयों में स्नान करने से पाप का नाश होता है। भगवान नारायण शेष शैय्या पर शयन करते हैं, इसलिए इन चार माह में सभी जलाशयों में तीर्थत्व का प्रभाव आ जाता है। प्रतिदिन दो बार स्नान करना हितकर माना जाता है। चातुर्मास में सादे बिस्तर पर शयन करना चाहिए। चातुर्मास में तांबे और लोहे के बर्तन में भोजन न करें। चातुर्मास में पत्तल पर किया गया भोजन पुण्यदायी माना गया है।

माना जाता है कि इन चार माह काला और नीले रंग का वस्त्र पहनने से स्वास्थ्य को हानि पहुंच सकती है। चातुर्मास में आहार कम से कम करना चाहिए। सत्य वचन बोलें। सत्संग सुनें और संतों की सेवा करें। इन चार माह में दान, दया और इंद्रियों को संयमित करने वाले को उत्तम लोक की प्राप्ति होती है। इन चार माह सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। चातुर्मास में अधिकांश समय मौन रहकर व्यतीत करना चाहिए। इन चार माह की अवधि में श्री हरि का पूजन करें। चातुर्मास में ही जैन धर्म का सबसे प्रमुख पर्व पर्युषण पर्व मनाया जाता है। चातुर्मास स्वयं को समझने और प्राणियों को अभयदान देने का अवसर माना जाता है।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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