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Chaitra Navratri 2019: भगवती को भी प्रिय है मां संबोधन

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शक्ति के दो स्वरूप होते हैं- आंतरिक शक्ति और बाह्य शक्ति। मां इन्हीं दोनों शक्तियों का एकीकृत स्वरूप हैं। मां शब्द देवी को बहुत प्रिय है। यह शब्द जगत का आधार है। मां ही हमारी सारी शक्ति का स्रोत हैं। देवी शास्त्र में मां भगवती के विभिन्न रूपों का वर्णन है। चैत्र नवरात्रि के अवसर पर मां की महिमा को बताता सूर्यकांत द्विवेदी का आलेख

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मां यानी शक्ति तत्व में सब प्राणियों की शक्ति निहित है। शक्ति तत्व दो प्रमुख शब्दों को रेखांकित करता है। एक ऋत् और दूसरा ऋतु। यानी प्रकृति और प्रवृत्ति इसके मूल तत्व हैं। आचार-विचार इसके प्राण हैं। देवी भगवती की आराधना भी इसी पर केंद्रित है। केवल मूर्ति पूजा कर लेने का नाम देवी आराधना नहीं है। हम अपने लोक जीवन में जिन-जिन शक्तियों को अभिव्यक्त करते हैं और जिनकी कामना करते हैं, वही शक्ति है। देवी कहती हैं कि शक्ति हर प्राणी में होती है। कोई उसका सदुपयोग करता है, तो कोई नहीं। जीव जन्तुओं में भी यही शक्ति समान रूप से होती है। लेकिन वे विवेक के अभाव में यह तय नहीं कर पाते कि उसका कहां प्रयोग करना है। श्री दुर्गा सप्तशती में देवी ने इस दृष्टि से मानव को श्रेष्ठ बताया है, क्योंकि उसके पास बुद्धि और विवेक है। नवरात्रि पूजा भी इसी शक्ति का पर्व है।

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शक्ति भी दो प्रकार की होती है। एक आंतरिक और दूसरी बाह्य। आंतरिक शक्ति का संबध सीधे तौर पर व्यक्ति के चारित्रिक गुणों से होता है। कहते हैं कि हम क्या हैं, यह हम ही जानते हैं। दूसरा रूप वह है, जो सबके सामने हैं। हम जैसा दिखते हैं, जैसा करते हैं, जैसा सोचते हैं और जैसा व्यवहार में दिखते हैं। यह सर्वविदित और सर्वदृष्टिगत होता है। लेकिन हमारी आंतरिक शक्ति और ऊर्जा के बारे में केवल हम ही जानते हैं। आंतरिक ऊर्जा या शक्ति दस रूपों में है। साधारण शब्दों में इनको धर्म, अर्थ, प्रबंधन, प्रशासन, मन, मस्तिष्क, आंतरिक शक्ति या स्वास्थ्य, योजना, काम और स्मरण के रूप में लिया जाता है। हमारे लोक व्यवहार में बहुत सी बातें गुप्त होती हैं और कुछ प्रकट करने वाली। जो प्रकट हो जाए, वह देवी और जो प्रकट न हो, वह शक्ति। यानी आंतरिक और बाह्य शक्ति। इन दोनों शक्तियों का एकाकार स्वरूप है मां। यही शब्द देवी भगवती को प्रिय है। यही शब्द जगत का मूलाधार है। यही शब्द प्रकृति है। यही शब्द प्रवृत्ति है। इस शब्द के आगे देवी भगवती के नौ अवतार, दश महाविद्या, षोडश माताएं समर्पित हैं। 

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मां ही क्यों

नवरात्रि की पांचवीं शक्ति स्कंदमाता हैं। स्कंदमाता अर्थात पार्वती जी का ही रूप। स्कंदमाता प्रथम प्रसूता और गर्भ की अधिष्ठात्री कही गईं। देवी को अजन्मा कहा गया। देवी ने भगवान शंकर से लोक हित में विवाह किया। उसके बाद कार्तिकेय जी का जन्म हुआ। कार्तिकेय के जन्म के बाद से ही तारकासुर नामक दैत्य का अंत हुआ। इस तरह विवाह से गर्भ धारण करने और संतानोत्पत्ति के सभी कारक देवी की आराधना से जुड़े हैं। इसलिए, वह नारी शक्ति कही गईं। वही सृष्टि और समष्टि का आधार बनीं। बीज, जन्म और विवास ये तीनों ही तत्व देवी से जुड़े। शक्ति (स्त्री तत्व) और शक्तिमान (पुरुष तत्व) ही शक्ति का शास्त्र है। देवी भगवती के मानस पुत्र हैं भगवान गणपति। देवों के देव। प्रथम पूज्य गणपति। एक समस्त और सुखी परिवार की कल्पना और उसका साकार रूप शिव परिवार में दिखाई देता है। यह परिवार की शक्ति है।

शक्ति के विभिन्न रूप

देवी शास्त्र में शक्ति के नाना रूप हैं। देवी भगवती प्रकृति की शक्ति हैं। वह पुत्र या पुत्री की शक्ति हैं। वह पति की शक्ति हैं। वह जल की शक्ति हैं। वह नभ की शक्ति हैं। वह थल की शक्ति हैं। वह विद्योतमा हैं। वह जलोधरी हैं। वह शाकुंभरी हैं। वह ज्वाला हैं। वह वैष्णो हैं। वह कात्यायनी हैं। वह कूष्मांडा हैं। वह ब्रह्मचारिणी हैं। वह शैलपुत्री हैं। वह कालरात्रि हैं। वह सौंदर्य की शक्ति हैं। वह गुणों की शक्ति हैं। वह गुणातीत शक्ति हैं। वह हमारे मन की शक्ति हैं। वह हमारे तन की शक्ति हैं। वह हमारे अध्यात्म की शक्ति हैं। वह हमारे बुद्धि, विवेक और चित्त की कारक शक्ति हैं। यह केवल किताबी नहीं है। संतान में सर्वाधिक गुण मां के ही होते हैं। मां ही बच्चे में संस्कार का बीजारोपण करती है। मां ही बच्चे की दशा और दिशा तय करती है। इसलिए, देवी भगवती हर उस तत्व की कारक शक्ति हैं, जो जीवात्मा से जुड़ा है। मां के प्रति संतान का और संतान के प्रति मां का लगाव ही मोह शक्ति है। यह स्वाभाविक प्रकृति जन्य गुण है। अस्तु, देवी भगवती के शास्त्रों में उनको सबसे बड़ा संबोधन मां का ही दिया गया।

सामरिक शक्ति

श्री दुर्गा सप्तशती में देवी के नाना संग्राम का उल्लेख है। गौर से देखें तो पहला युद्ध अपने से है। राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य अपने मन से हारे व्यक्ति हैं। राजा सुरथ का राजपाट छिन गया। समाधि नामक वैश्य धन, स्त्री और पुत्र से वंचित हो गए। जो था, वह आज पास नहीं है। यही युद्ध तो आज चारों ओर है। मधु-कैटभ, महिषासुर, चंड-मंुड, धूम्रलोचन, रक्तबीज और शुम्भ-निशुम्भ के साथ संग्राम में देवी भगवती सामरिक शक्ति की द्योतक हैं। यह केवल युद्ध नहीं है। यह केवल शत्रुओं का दमन नहीं है। यह हमारे मानसिक और शारीरिक विकारों का दमन है। देवासुर संग्राम में देवी भगवती ‘एक से अनेक' और ‘अनेक से एक' का रण कौशल दिखाती हैं। यही तो हमारी सामरिक शक्ति है। हम भले ही अनेक दिखें, लेकिन हैं एक। 

ग्रहों की शांति के देवी मंत्र 

‘सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्।' यह सर्व ग्रह शांति का मंत्र है। मान लीजिए, आप पर शनि की महादशा चल रही है, तो आप पहले शनि मंत्र लगाएं- ‘ऊं शं शनैश्चरायै नम: ऊं सर्वाबाधाप्रशमन त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्।'

इसी तरह जिस ग्रह की महादशा हो, उसका मंत्र पहले लगाकर इस मंत्र को पढ़े, देवी भगवती ग्रहों के होने वाले बुरे प्रभावों को दूर करेंगी।

‘ऊं सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके, शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तु ते।।' - यह प्रसिद्ध मंत्र है। इसको चौदह बार पढ़ें।

संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का लाभ लेने के लिए देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक मंत्र पढ़ें। लेकिन अंत में देवी सूक्तम अवश्य करें।

श्री दुर्गा सप्तशती में 13 अध्याय हैं। यदि संपूर्ण पाठ नहीं कर सकें तो पांचवां, सातवां, आठवां और ग्यारहवें में से किसी एक का पाठ कर सकते हैं। अर्गला स्तोत्र के समस्त मंत्र ही प्रभावशाली और अचूक हैं। अर्गला स्तोत्र *मात्र से भी संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का लाभ प्राप्त होता है। ‘देहि सौभाग्यमारोग्यम् देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।'

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